सारे सपने कहीं खो गए
सारे सपने कहीं खो गए
1 min
569
बचपन चार दीवारों में गुजारा
हँसते खेलते बिता सारा
माँ बाप ने पुलों की तरह संवारा
जिंदगी को यूँ सजाया संभाला।
वक्त बिता बड़े हो गए
बड़ों ने जो कहा वही करते
चले गए
किसी ने पूछा क्या अपने लिए
कभी जिए
तब होश आया, हाय हम क्या
से क्या हो गए ।
सपने तो बहुत है
मगर पूरे नहीं हुए है
अरमान तो बहुत है
मगर रास्ते नहीं मिले है।
टूटते है बिखरते है
अकेले में रोते है,
कभी तो सपने पूरे होंगे
मेहनत का फल ज़रुर देंगे
क्या हुआ गर हम अकेले है।
कामयाबी कदम ज़रुर चूमेगी,
ये एतबार करते है,
उम्मीदों का दामन हम थामे
हुए है
इसलिए हम ग़म मे भी मुस्कुराते
रहे हैं
इसलिए हम ग़म मे भी मुस्कुराते
रहे हैं ।
