रिश्ते
रिश्ते
अजीब से रिश्ते हैं
अलग से समाज में
कोई अपना और बेगाना
अपने ही रिश्ते में
रिश्तों की राह में
निकलते है सब मगर
पर निभाने वाला ही
निभाता है अनेक तरह
अजीब सी बाते है
पर कोई समझता नहीं
अपनो को ही
ठोकर देता है हर कोई
मन से उतरते है लोग
अपनो की आँखों से
नये उमंग की तलाश में
अपनो को ही अलग करते है
जैसे पराये है वो
नये जमाने की लहर में
दिल से उतरते है इस तरह
रिश्तों पर अहमियत
नहीं रही पहली जैसी
तरक्कियों के राह में
माँ - बाप को भूल
जाते है लोग
अपने जीवन के
नये तराने में बह जाते
रिश्तों को संभालकर
रखा करो...
इन्हें आदर व सम्मान
दिया करो
नये अजूबों से मिला करो
पर माँ - बाप का
पहले आदर - सम्मान
हक से करा करो..
रिश्तों की चाहत
नहीं रही पहली जैसी
जो भाई - बहन के लिए
रोया करते थे दिन - रात
अब तो बस
नाम का सिर्फ रिश्ते है
कुछ पल के अपने
फिर बेगाने हैं
पहले जैसे कहा रहे
वो रिश्ते
जो मन ही मन से
तन - मन के भीतर
अपने अपनो से
जूड़ा करते थे
अब वो कहा मिलते है
रिश्ते को संभालकर
इसलिए रखा करो
वह दिल ही दिल
जूड़ा करते है
मन को पूरी तरह शांत
एक - दूसरे की
अहमियत सिखा जाते है
माँ - बाप के आंसू
दुनिया की नई रीत
सिखा जाते हैं..
अपने को अपनो की
तरह दिल में बसा के रखना
वही सबसे अनमोल हीरे है
वह हर नाते से बड़े सितारे है...
