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Anita Gupta

Others

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Anita Gupta

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मेरा मन

मेरा मन

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मन करता है मेरा

बन पंछी दूर उड़ूं 

ऊँचे नील गगन में,

पंख फैलाकर

अपनी धुन में

फिरती रहूँ

पूरे चमन में,

न आशियाने की फ़िक्र

न रोजी की चिंता,

चंद तिनकों का घर

होता एक नन्हा घोंसला,

जब भी जी चाहता

दूर तक उड़ती जाती,

जो भी मिल जाता

उससे पेट भर लेती,

चंद बूँदों से मेरी

प्यास बुझ जाती,

न बंदिश होती मुझपर

धर्म की और कर्म की,

किस्मत में क्या लिखा है

इसका कोई विचार न होता,

जब जहाँ जी चाहता

अपना घोंसला बनाती,

दूर दूर तक फैली हरियाली

सारी प्रकृति मेरी होती,

नहीं टोकता कोई मुझको

खुले आसमां के तले

मेरी अपनी उड़ान होती,

चाहे इसे आप कहो बचपना

या कहो पागलपन मेरा,

मन करता है मेरा

हां कभी कभी मन करता है मेरा।



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