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AASHUTOSH SONI

Tragedy

5.0  

AASHUTOSH SONI

Tragedy

मैं परिंदा !

मैं परिंदा !

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आईना जब भी देखूँ मै, परिंदा याद आता है,

है नन्हीं जान फिर भी, आसमाँ चाहता है |


भले ही है मुसीबत, सैकड़ों हैं दर्द दिल में,

भुला कर इनको, सबसे दूर जाना चाहता है !


हवा भी रुख बदलती, कुछ थपेड़े मार देती,

गिराती और बहाती, दूर भी फटकार देती |


पर अपने पंख ये ऐसे फैलाना चाहता है,

चीर कर उसको दिखाना चाहता है !


ये मेरी बात मानों या ना मानों,

ये दुनिया बंद मुट्ठी में दीवानों ।


हो जिनके हौसलों में बुलंदी,

उन्हें कैसी, कहाँ, कोई पाबंदी |


वो हर गर्दिश पहुंचना जानता है

तभी पंछी सा बन वो भी उड़ना चाहता है !


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