मैं माँ हूँ
मैं माँ हूँ
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मैं दर्पण अपनी बेटी की
मुझ में दिखती उसकी सूरत हैं।
चंचल सी वो बड़ी सयानी
कितनी प्यारी उसकी सूरत हैं।।
फलक सी उतरी फरिश्ता हैं वो
और उसको मैं पहचानती हूँ।
अरे मैं माँ हूँ
शायद मैं बेहतर जानती हूँ।।
उसकी रोती सूरत
क्यों मुझसे देखी जाती नहीं।
उसके पुराने खिलौने
क्यों मुझसे फेंके जाते नहीं।।
बेटी नहीं दुनिया हैं मेरी
और इस बात को मैं मानती हूँ।
अरे मैं माँ हूँ
शायद मैं बेहतर जानती हूँ।।
माँ होना आसान नहीं ।
इस बात को मैं जान गई
मगर इससे बेहतर एहसास नहीं
इस बात को भी मैं मान गई।।
जिसमें उसका हँसता चेहरा हैं
सिर्फ उन लम्हों को जानती हूँ।
अरे मैं माँ हूँ
शायद मैं बेहतर जानती हूँ।।
