STORYMIRROR

Sugendha Jain

Others

3  

Sugendha Jain

Others

ख्वाहिश

ख्वाहिश

1 min
228

कुछ जख्म बहुत है दिखाने को 

कुछ दर्द बहुत है बताने को

कहना सुनना सब अधूरा सा है 

कुछ रिश्ते जो है बचाने को

क्यों करते हैं गलतियां हम 

यह हम होते हैं या हमारे हालात

कुछ सिसकियां है बह जाने को 


कुछ जख्म बहुत है बताने को.....

कब बने कब बिगड़ गए 

यह छोटे छोटे से प्यार भरे रिश्ते

आज वक्त है कुछ बिगड़ा हुआ सुधार जाने को।।


कुछ जख्म बहुत है दिखाने को 

कुछ दर्द बहुत है सुनाने को....



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Sugendha Jain