जूता मेरा
जूता मेरा
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जब भी बढ़ जाती है ठंडी बहुत
बन जाता तभी ये जान है जूता
किसी की बन जाये ये जरूरत
तो किसी की बस शान है जूता।
किसी के तो ढेरों बिखरे रहते
तो किसी का अरमान है जूता
कोई खुश होकर छूता इसको
गुस्से में चलना आसान है जूता।
खो जाता जब कोई एक जब भी
नहीं होता कभी मेहरबान है जूता
रहता नहीं जिंदा एक दूजे के बिन
दो बदन लेकिन एक जान है जूता।
