Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer
Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer

Pawan Makwana

Others

3  

Pawan Makwana

Others

जीवन और बारिश भाग - 2

जीवन और बारिश भाग - 2

2 mins
216


आँखों पर हाथ रखे

वह देख

रहा था

टकटकी लगाए

आस है जिनके

रुकने की

बरसने से

गति तगड़ी

लिए मजदूर की

जो

कमर पर

लपेटे मैली सी

चादर

भूख मिटाने

के

यंत्र की भांति

सड़क किनारे

खड़े

अपनी

काग़ज की

फिरकियों के

रूप में

अपने सपनों

को

बारिश के पानी में

गलता देख

रहे

अधनगें

कपड़े पहने

उस

अधेड़ की

ठेले पर

आधे कच्चे

आधे पके

केले लिए बैठी

मक्खियां उड़ाती

उस बूढी

नानी की

जो पाल रही है

अपनी मृत

बच्ची के

बच्चों को

जिन्हे

छोड़ गया

उनका जल्लाद

बाप

जब वह

बेच ना पाया

बूढी नानी के

विरोध के चलते

अपनी मासूम

बेटियों को

किसी और जल्लाद

के हाथ

दारु से

अपना गला

तर करने

आस है इन

सबको

की

रुके बारिश

तो

शुरू हो काम

उस

ऊँचे भवन का

जिसके भरोसे

छोड़ आये हैं

अपना गाँव

कई मजदूर

की

बारिश रुके तो

खुले उनके पेट

पर बंधी

वह चादर

रुके बारिश तो

रुके

गलना फिरकियों का

आएं बच्चे

ग्राहक

के रूप में

भगवान् बनकर

और

हो इंतजाम

बच्चों के

स्कूल के शुल्क का

हो आसरा

फिर जीने का

चार दिन

की अब बादल

बंद करे

गरजना

रुके पानी

तो अधपके

केले बिके

नानी के

घर के कोने

में दुबके

हाथ में

बर्तन थामे

छत को तांकते

बैठी होगी

नातीनें

की

खान से गिर रहा

है पानी

यह पता लगे

की

कहाँ से

नहीं टपक

रही है

छत

कब आएगी

नानी

की

इन्तजार है

पेट भरने

से पहले

डाल छत पर

तिरपाल

इस बार

ठेले पर बैठी

नानी

आँखों में

लिए पानी

मना रही है

ईश्वर को अपने

और मांग रही है

मन्नत बादलों से

की

अबके जैसे

तुम बरसे हो

वैसे तुम ना आना

फिर हमको ना सताना


Rate this content
Log in