बारिश और जीवन - भाग १
बारिश और जीवन - भाग १
आँखों पर हाथ रखे
वह
देख रहा था
टकटकी लगाए
बादल को
आस है जिनके
बरसने की
आस बंधी है
जिनसे
मंगलू की धापू की
खेत में खड़े
बबूल
की दाल पर
बैठी चिड़िया की
खेत की मेढ़
के किनारे
बिल में
बैठे मूषक
मेंढक की
और वहीँ
मारे कुण्डली
बैठे
काले नाग की
कि बादल
गरजेंगे
पानी बरसेगा
हल चलेंगे
बीज डालेंगे
छाएगी हरियाली
होगी हर और
ख़ुशहाली
हरे-भरे खेत
देख
हर्षायेगा मन
की अब
होंगे सारे दुःख
दूर
हो दीवाना
मज़दूर गायेगा
दूर नहीं
अब वो
दिन
जब धापू-मंगलू
का बस्ता
कॉपी किताब
ड्रेस स्कुल की
और जूते आएंगे
दूर नहीं दिन
जब बच्चे
नई पोषाक
पहन
इतरायेंगे
कमला-विमला
सखियों संग
गायेगी गीत
बादलों की तारीफ़ में
की तुम ना होते
तो
क्या होता हमारा ...?
बबूल की डाल
बैठी
चिड़िया दोहराएगी
गाना
की
उसे और उसके
बच्चों को
भरपेट मिलेगा खाना
खेतों में
दौड़ते फिरेंगे
मूषक
चुगने को दाना
जाएँ कैसे
बचाकर नज़र
खेत में
बुनेंगे
ताना-बाना
आएगा मजा
अपने पीछे
दौड़ते
किसान को
देख
हड़का के हमें
उड़ा के चिड़िया
किसान
बनेंगे सेठ
अपनी
मूछों को ऐंठ
नींद से जागेंगे
नागराज
कि चलो
हो गई है बारिश
खेतों में
शुरू धमा-चौकड़ी
चूहों-मेंढकों की
घिर आया होगा
किट-पतंगों से
आसमां
कि
अब चलो
समय नहीं है
ये
सोने का
कहीं दूर बैठा
पपीहा
गा रहा है
तराना ख़ुशी का
जिसकी मद्धम
आवाज़ घोल
रही है अमृत
कानों में
मंगलू-धापू कि
माँ
आँखों में लिए
आँसू खुशी के
शुक्र मना रही है
और मांग रही है
मन्नत
बादलों से
कि
अबके जैसे
देर अगले बरस
अगले बरस
अगले बरस
से ना आना...
