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Hitesh Awara ji

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Hitesh Awara ji

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हरी ‌‌ॐ शंभू नाथ

हरी ‌‌ॐ शंभू नाथ

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मैं जिक्र करूं तो क्या करूं

अल्फाज़ मेरे भी मौन है


है ज्ञान की काबिलियत

वो ज्ञानरुपी द्रोण है 


है तेज ए आनन जिनके

स्वाभाविक विस्तार भी


जीने योग्य जीविका में

अमूल्य किरदार भी


वो पाते हैं प्रताप शंभू

ह्रदय कि गहराई से


ना ही वो व्याकूल है

वैचारिक कठिनाई से


ह्रदय में ही जिनके

है दया विद्यमान भी


है मन मेरे का अहम वो

संपूर्ण स्वाभिमान भी 


श्री सोमनाथ शंभू शिवाय

ढाल है शमशीर है


प्रयत्न है मनन का की

वो मौन है सूधीर है


श्री सोमनाथ त्रिलोकी बाजे

डमरू शिव का डमा डमा


कर शुन्य शिव जिस्म को

मेरे रोम रोम में रमा रमा


हष्ट पुष्ट ज्येष्ठ शंभू

अधिगम का आकाश भी


मुझसे जुगनू के समक्ष

वो सूर्य सा प्रकाश भी


ज्ञान है अनंत ज्ञान

निरंतर सरिता जैसा


वो गालिब की गज़ल भी

आवारा कि कविता जैसा।



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