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AJAY AMITABH SUMAN

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AJAY AMITABH SUMAN

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गरल

गरल

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हृदय प्रभु ने सरल दिया था,

प्रीति युक्त चित्त तरल दिया था,

स्नेह सुधा से भरल दिया था ,

पर जब जग ने गरल दिया था,

द्वेष ओत-प्रोत करल दिया था ,

तब मैंने भी प्रति उत्तर में ,

इस जग को विष खरल दिया था,

प्रेम मार्ग का पथिक किंतु मैं ,

अगर जरूरत निज रक्षण को, 

कालकूट भी मैं रचता हूँ,

हौले कविता मैं गढ़ता हूँ, 

हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।



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