बचपन का नूर
बचपन का नूर
वो समय कितना अच्छा रहा होगा,
जब सफेद बालों वाला पिता भी
कभी बच्चा रहा होगा।
मिट्टी की खुशबू से सजा,
वो गाँव कितना प्यारा रहा होगा।
हर शाम चूल्हे से उठता धुआँ भी,
सपनों से भरा रहा होगा।
गलियों में घूमते, कभी भटक जाता होगा,
पहली बारिश की बूँदों से, वो भी जगमगाता होगा।
किताबें अपने सपनों की हर रोज सहायता होगा,
आज जिसके माथे पर शिकस्त है,
कभी उसके चेहरे पर बचपन का नूर रहा होगा।
ये बूढ़ा पिता भी कभी बच्चा रहा होगा।
वो आज भी उस वक़्त को याद करके मुस्कुराता होगा,
जब मुँह में पेंसिल, हाथ में कॉपी,
और कंधे पर बस्ता लेकर स्कूल जाता होगा।
काम न होने पर मास्टर भी खूब डाँट लगाता होगा,
घर आकर अपने स्कूल की सारी बातें बताता होगा।
पिता की डाँट से बचने के लिए
माँ के आँचल में छुप जाता होगा।
हमारी शरारतों पर रोक लगाने वाला,
खुद भी कभी शरारती रहा होगा।
आज जो बाइक पर हर कहानी जाता है,
बचपन में वो भी किसी की पीठ पर बैठकर सवारी करता होगा।
जो आज ज़िम्मेदारियों से बंधा हुआ है,
कभी वो भी अपने सपनों के पंखों से
आज़ादी की उड़ान भरता होगा।
