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समेट कर अपने दिल के टुकड़े को खुद को संभालना पड़ता है समेट कर अपने दिल के टुकड़े को खुद को संभालना पड़ता है
लिखती रही एहसासों को अपने बनती रही नई नई कहानी लिखती रही एहसासों को अपने बनती रही नई नई कहानी
मनपसंद व्यंजनों की कतार लगा देती थी आगोश में उसके हम बच्चे बन जाते थे मनपसंद व्यंजनों की कतार लगा देती थी आगोश में उसके हम बच्चे बन जाते थे
बाहर आने को मचलता ये मन सफर पर अकेला निकल पड़ता अक्सर। बाहर आने को मचलता ये मन सफर पर अकेला निकल पड़ता अक्सर।
तब भर कर अंजुली में उन्हें जोर से उछाल देती हूं तब भर कर अंजुली में उन्हें जोर से उछाल देती हूं