मेरी पीड़ा
मेरी पीड़ा
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थक जाती हूं जब जब अपने दर्द और घुटन से नाकाम हो जाती हूं
मुस्कान के पीछे छिपाते छिपाते
तब भर कर अंजुली में उन्हें
जोर से उछाल देती हूं
बादलों से ढके आकाश की ओर
मेरी पीड़ा और संवेदना देख
रो पड़ता आसमान भी
शायद तभी आंसू बन बूंदें
नहला जाती इस जमीं को
