दोस्ती पेड़-पौधों से
दोस्ती पेड़-पौधों से
एक समय की बात है।
किशनपुर गाँव में भोला नाम का एक आठ वर्षीय लड़का अपने माता-पिता के साथ एक छोटे-से घर में रहता था। भोला अपने माता-पिता का इकलौता पुत्र था।
एक दिन उसके माता-पिता पास के मंदिर में हो रहे कीर्तन में गए। वहाँ लोगों की काफ़ी भीड़ थी। उस दिन भोला का कीर्तन में जाने का मन नहीं हुआ, इसलिए उसने अपने माता-पिता के साथ जाने से इंकार कर दिया और घर पर ही रुक गया।
घर में अकेला होने के कारण उसे बोरियत महसूस होने लगी। तभी वह सीढ़ियों से नीचे उतरकर आस-पास के आँगन में टहलने लगा। अचानक उसके मन में एक विचार आया। वह मन-ही-मन बोला,
“जब तक मेरे माता-पिता लौटकर नहीं आते, क्यों न मैं मटकी में पानी भर लूँ। माँ देखेगी तो खुश हो जाएँगी।”
यह सोचकर वह घर से मटकी लेकर टहलते-टहलते जंगल की ओर चल पड़ा। जंगल पहुँचते ही वह चारों ओर फैले प्राकृतिक दृश्यों को देखकर आनंदित हो गया। उसके कानों में चिड़ियों की मधुर चहचहाहट गूँजने लगी।
गर्मी का मौसम होने के कारण भोला पसीने से भीग गया। उसने चमचमाती धूप की ओर देखा और मन-ही-मन बोला,
“आज तो बहुत गर्मी है। ऊपर से प्यास भी लग गई है।”
थोड़ा आगे बढ़ने पर उसे जंगल के पास ही बहती हुई एक नदी दिखाई दी। नदी का साफ़ पानी देखकर वह बोला,
“अरे वाह! यहाँ का पानी तो बहुत स्वच्छ लग रहा है।”
उसने अपने हाथों में नदी का जल लिया और चेहरे को धोया। फिर उसने पानी पिया। पानी पीते ही उसे मन में बड़ी तृप्ति और शांति का अनुभव हुआ।
इसके बाद भोला ने मटकी को नदी में धोया और गुनगुनाते हुए उसमें पानी भर लिया। जैसे ही वह जंगल की ओर बढ़ा, मटकी का कुछ पानी छलककर पास खड़े केले के पेड़ पर गिर गया।
तभी अचानक एक आवाज आई,
“और पानी पिलाओ…”
आवाज़ सुनकर भोला चौंक गया। उसने इधर-उधर देखा और बोला,
“अरे! कौन है यहाँ?”
तभी केले के पेड़ ने कहा,
“मैं बोल रहा हूँ।”
और वह ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगा।
पेड़ की बात सुनकर भोला आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगा। केले के पेड़ ने फिर कहा,
“मुझे बहुत प्यास लगी है, थोड़ा पानी पिला दो।”
भोला ने मटकी का पानी पेड़ में डाल दिया। पानी पड़ते ही केले का पेड़ हरा-भरा हो गया। यह देखकर भोला मुस्कुराया। तभी पेड़ पर केले निकल आए।
केले के पेड़ ने कहा,
“धन्यवाद! जल मिलते ही मेरी प्यास बुझ गई। तुम चाहो तो केले ले सकते हो।”
भोला ने खुशी से कुछ केले तोड़े और बोला,
“मैं रोज़ तुम्हें पानी पिलाने आऊँगा।”
आगे बढ़ते हुए भोला एक पत्थर से ठोकर खा गया और मटकी का पानी एक फूल के पौधे पर गिर गया। तभी पौधे से आवाज़ आई,
“आह! कितना ठंडा पानी है। थोड़ा और पिला दो।”
भोला ने पौधे में फिर पानी डाला। पौधा हरा-भरा हो गया और उसमें कलियाँ निकल आईं, जो थोड़ी देर में फूल बन गईं।
फूल के पौधे ने कहा,
“जल ही हमारा जीवन है।”
तभी सारे पेड़-पौधे एक स्वर में बोले,
“अगर तुम हमें जल दोगे, तो हम तुम्हें फल, फूल और छाँव देंगे।”
भोला यह समझ चुका था कि जल ही पेड़-पौधों का भोजन और जीवन है।
वह बोला,
“मैं हमेशा पेड़-पौधों को पानी दूँगा और अपने दोस्तों को भी यह ज्ञान दूँगा।”
घर लौटने के बाद भोला ने अपने आँगन में पौधे लगाने शुरू किए और उन्हें नियमित रूप से पानी देने लगा। कुछ ही समय में उसका आँगन हरा-भरा और फूलों से भर गया। उसके माता-पिता यह देखकर बहुत प्रसन्न हुए।
धीरे-धीरे भोला प्रकृति प्रेमी बन गया।
जब भी उसे सुकून चाहिए होता, वह नदी किनारे जाकर प्रकृति के नज़ारों को देखता और आनंद से भर उठता।
सोनम शर्मा
