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सुनो अमृता!
सुनो अमृता!
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© ललित कुमार मिश्र Sonylalit

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सुनो अमृता!

अच्छा हुआ

जो तुम लेखिका थी

क्योंकि अगर तुम लेखिका न होती

तो निश्चित तौर 

तुम्हें चरित्रहीन और

बदलचलन की श्रेणी में रखा जाता।

अच्छा हुआ तुम असाधारण थी

क्योंकि साधारण स्त्रियों की ज़िंदगी में

तीन-तीन पुरुषों का होना

वैश्यावृत्ति माना जाता है

अच्छा हुआ अमृता

तुम बोल्ड थी

इसीलिए तुम्हारे मुंह पर

किसी ने कुछ न कहा

किन्तु यह भी सत्य है

आज इमरोज़ की कामना करने वाली 

कोई भी स्त्री अमृता बनना नहीं चाहेगी

क्योंकि दहलीज़ों को लांघना

कोई मज़ाक नहीं है।

लेखिका चरित्रहीन पुरुष

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