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ज़माने की भीड़ में.
ज़माने की भीड़ में.
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© Nitin Kumar

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ज़माने की भीड़ में वो कुछ ख़ास हो गया है
मेरे साथ रह-रह के मेरा एहसास हो गया है

बड़ी से बड़ी रुसवाई पे भी वो हँसता रहा मगर
आज किस ज़रा सी बात पे वो उदास हो गया है

मुंतज़िर हूँ मैं बरसों से,वो मिलने नहीं आया
मुझसे ज्यादा वो और किस के पास हो गया है

हल्की एक चिंगारी से भी सुलगने लगूँगा मैं
मेरा जिस्म तेरी याद में कपास हो गया है

मेरे आँगन में बिख़री ख़ामोशी को समेट दे आके
तेरे बाद, मेरे घर में तन्हाई का वास हो गया है

 

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