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अंधश्रृद्धा
अंधश्रृद्धा
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© Kavi Vijay Kumar Vidrohi

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कहो यदि सक्षम हो तो, इक कटुकसत्य दिखलाऊँ मैं । 
है कितना तुमको धर्मज्ञान, ये आज तुम्हें बतलाऊँ मैं । 
राधे-राधे गुण गाओ , जय निर्मल , आशाराम कहो । 
कुल्टा को देवी कह दो ,पाखंडी को घनश्याम कहो । 

कसमस यौवनधन,नग्नवेश ,कामुकता भरी सभाओं में ।
अब कहाँ मिलेंगे वेदमंत्र ,  भारत की पुण्य हवाओं में ।
भक्तवेश में नारी छूकर , जब तुमको आनंद मिले । 
बतलाओ तुम जैसों को , कैसे ना नित्यानंद मिले । 

वेदांतिस का अमिटनाद, गूँजे है वसुधा अम्बर में ।
धन्य-2 हे भक्तजनों ! तुम लिप्त पड़े आडम्बर में । 
हिंदू –हिंदू रटते पर दिल में, भगवे का सम्मान नहीं ।
छोड़ो ये झूठे शंखनाद , तुम सनातनी संतान नहीं ।

भगवा भ्रष्ट भक्तजन पाकर , सुबक रहा पंडालों में । 
शर्म गटक कर सब संरक्षक , मिल बैठे चंडालों में । 
शेष यदि मानवता तो , अब दुष्कर्मों पर शर्म करो ।
वरना अपने पापी करतल में , जलभर लो डूब मरो । 

बाबा पाखंडी पाखंडी बाबा अंधविश्वास अंधश्रृद्धा विद्रोही कवि विद्रोही ओजकवि विद्रोही

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