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स्वार्थ
स्वार्थ
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© Swapnil Jha

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आसमाँ ऊपर पड़ा, पाताल नीचे है

देवेश ने वृष्टि से सारे भूमि सींचे हैं

हम उसे हर रोज़ झुककर कर रहे नमन

देख दुनिया की गति हम आँख मींचे हैं |

 

सोच ऐसी बन गई सब कुछ ये अर्थ है

काम कुछ भी हो भले , पर स्वार्थ – स्वार्थ है

छोड़ो ज़रा अहम् को भी , फेंको इसे परे

चेतो जरा ऐ मानवों , ये तो अनर्थ है |

 

होकर भला इंसान भी अपने को ठगते हो

अपने ही परिजन हेतु तुम ख़ुद जाल बुनते हो

अच्छाई इसमें कुछ नहीं यूँ फँस के रोओगे

छोड़ो इसे अब भी सही , क्यों स्वार्थ चुनते हो ?

 

भगवान भी अब रो पड़े , धरती भी रोई है

देवी भी तुमसे रूठकर , अब दूर सोई है

सोच कर निज स्वार्थ तुम करते रहे गलती

देते रहे गाली की अपनी भाग्य सोई है |

 

 

- स्वप्निल कुमार झा

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