सुयोग्य वर

सुयोग्य वर

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बाबा ये क्या आप अभी तक जाग रहे हो, और ये लैपटाप पर क्या कर रहे हैं अच्छा ये बताओ आपने अपनी दवा ली, सुकीर्ती नें अपने बाबा के कमरे में बैड के बगल रखे टेबल में से अपने बाबा की दवाईयाँ निकालने लगी।

सुकीर्ती बेटा तू कितना मेरा ख्याल रखती है, बिल्कुल मेरी माँ और अपनी माँ की तरह, पहले मेरी माँ मेरे लिए खुद खाली पेट सो जाती थी ताकी मैं आराम से सो सकूँ और फिर जब तेरी माँ आई तो वो मेरे इंतजार में देर रात रात भर जागकर मेरे खाना गरम मुझे खिला सके ऐसी कोशिश वो पूरे सप्ताह करती थीं। और एक तू है तू भी बिल्कुल अपनी दादी और माँ की परछाईं है। जब तक मैं न सो जाऊँ तब तक तुझे नींद कहाँ आती है।

कैलाश जी अपनी आँखों के आँसूओं को छिपाने की लाख कोशिशें करने के बावजूद वो उससे अपने आँसूओं को छिपा पाने में न कामयाब होते हैं। क्या बाबा आप भी, अच्छा ये लीजिए अपनी दवाएँ और चलिए चलकर सोईये, बाकी का काम कल कीजिएगा। सुकीर्ती अपने बाबा को चद्दर ओढ़ा कर और लाईट बंदकर दरवाज़े की तरफ बढ़ जाती है।

सुकीर्ती अपने कमरे में जाने से पहले वो अपनी मरी हुई माँ की तस्वीर के आगे नम हुई आँखों से तस्वीर को निहारती है, माँ देखो न बाबा मुझे लेकर कितना परेशान रहते हैं उन्हे हर वक्त मेरे विवाह की चिंता सताये रहती है, माँ आप ही बताओ कि मैं उनको छोड़कर कैसे जा सकती हूँ, क्योंकि अगर मैं चली गयी बाबा का ख्याल कौन रखेगा। मेरे सिवा उनका है ही कौन? वो तो खुद एक छोटे बच्चे की तरह है जिसे सब कुछ उनकी दवाइयों से लेकर उनके दूसरे काम तक सबकुछ उनके हाथ में देना पड़ता है, कुछ भी वो खुद से नहीं कर पाते या फिर... माँ मैं नहीं होंगी तो फिर कौन ध्यान रखेगा?


फिर सुकीर्ती अपने कमरे की तरफ जाती है और कल की तैयारियों में जुट जाती है। उसे टाॅस्क जो पूरा करना था, सुकीर्ती एक फूलों के शाॅप पर काम करती है। जिससे वो घर की ई एम आई भरती है और उसके पापा के दवाइयों, अपनी पढ़ाई का ख़र्चा और घर का ख़र्चा उठाती है। कैलाश जी भी अब नौकरी से रिटायर्ड हो चुके हैं, तो अब वो भी अपनी बेटी की जिंदगी बनाना चाहते हैं।

शाम को कैलाश जी सुकीर्ती से कहते हैं कि सुकीर्ती एक लड़का है जो तुझ से एक घंटे में मिलने पास वाले कैफेटेरिया में आने वाला है, मुझे तो बहुत ही पसंद है। बस तू भी एक बार उससे मिल ले और अगर तुझे पसंद आता है या तुझे लगता है कि वो तेरे लिए सुयोग्य वर है तो हम बात आगे बढ़ायेंगे। सुकीर्ती का मन न होते हुए भी वो अपने बाबा की खुशी के लिए एक घंटे में तैयार होकर वो कैफेटेरिया पहुँचती है।

 काॅफी आर्डर कर वहीं उस लड़के का इंतजार कर रही होती है, काॅफी पर बना हुआ शेप उसे खुशी के साथ सुकून भी दे रहा था, लेकिन उस लड़के से मिलने के बारे में सोच सोचकर उसके हृदय की धड़कन बढ़ती जा रही थी। काॅफी की चुस्की लेकर वो अपने मोबाईल पर अपनी नर्वसनैस को कम करने के लिए स्क्रीन को इधर उधर घुमाने लगी।

करीब आधे घंटे बाद उसकी टेबल के सामने एक स्मार्ट और हैंडसम लड़के को खड़ा पाया, उसने ब्लू जींस, सफेद शर्ट और वाईन कलर का जैकेट पहना हुआ था, करीब 30 से 35 की उम्र में भी बेहद आकर्षक लग रहा था। एक मिनट के लिए तो सुकीर्ती जैसे उसमें ही खो गई थी। लेकिन गाॅगलस हटाकर जब उसने पूछा कि क्या आप सुकीर्ती हैं, सुकीर्ती अपनी टेबल से उठ खड़ी हुई और उन्हे बैठने का इशारा किया। बातों का सिलसिला शुरू हो उससे पहले दोनों फिर काॅफी का आर्डर दिया और उसके बाद दोनो ही आपस में धीरे धीरे खुलने लगे। बातों का सिलसिला पहले दोनों के नाम जानने से शुरू हुआ, फिर उनकी पसंद नपसंद वगैरह वगैरह, धीरे धीरे उन दोनो को ही लगने लगा कि जैसे वो दोनों एक दूसरे को बरसों से जानते हो।

दोनों को ही वहाँ एक दूसरे से अलविदा कहने को मन नहीं हो रहा था, मगर उस लड़के (अभिराज) नें ही उससे काम का बहाना कर, एक दूसरे को अलविदा कह दोनों अपने अपने घर की ओर रवाना हुए। घर पहुँचते ही सुकीर्ती तो कहीं खोयी हुई सी थी उसके बाबा ने जब पूछा तो सुकीर्ती नें कहा कि बाबा आपकी तलाश पूरी हुई। मुझे मेरा सुयोग्य वर मिल चुका है और कहकर शर्म से लाल हुई सुकीर्ती अपने बाबा के सीने से लग जाती है।

               



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