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Saurabh shubh

Children Stories Inspirational Children

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Saurabh shubh

Children Stories Inspirational Children

सर्कस वाला लड़का

सर्कस वाला लड़का

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गर्मी का मौसम था और शाम का पहर भी। मेले में लोगों का हुजूम देखने लायक था। लोगों की भीड़ ने उस जगह को जरूरत से ज्यादा गर्म कर दिया था...हालांकि मद्धिम ठंडी हवा रह रहकर इस बात को चुनौती दे रही थी।

बांसुरी, सीटियों के आवाज़ के साथ-साथ झुलवा झूल रहे बच्चों का आनंद और शोर मेले के चार चांद की रौशनी बढ़ा रहा था। ठेले और फेरीवाले ने भी अपने हिसाब से नारे गढ़ लिए थे। दूर-दूर तक सन्नाटों की कोई खोज-खबर न थी मानो खुद को इन्होंने क्वारंटाइन कर लिया हो।

मैं और शुभम शर्बत के स्टॉल पर शर्बत पीते हुए मेले के इस क्षणिक सौंदर्य की अनुभूति कर रहे थे कि तभी हमने देखा कि एक करीब 12 साल का लड़का और लगभग 8 साल की बच्ची बहुत से लोगों का आकर्षण का केंद्र बने हुए थे... पास जाकर देखा तो वह लड़का और बच्ची एक घेरे में कुछ कला और सर्कस दिखा रहे थे..!!

लड़का कभी रस्सी पर चलता, तो कभी बांस के डंडे पर खड़ा होकर नाचने लगता तो कभी रिंग में से आर-पार हो जाता और कभी उल्टा लटककर अजीब तरह से अपने शरीर को मोड़ लेता..!!

सब कुछ ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे समग्र संसार इसी के इर्द-गिर्द घूम रहा हो। हुनर मेले में तमाशा कर रही थी और दुनिया तमाशे देखकर खुश हो रही थी।

दो वक्त की रोटी के लिए वह ज़िन्दगी की जद्दोजहद दिखा रहा था और लोग तमाशा समझ कर तालियाँ बजा रहे थे...लड़के के सर्कस क्षेत्र को घेरे लोग अपने अपने समझदारी के हिसाब से टिप्पड़ी भी कर रहे थे, वह 8 साल की बच्ची जो शायद उस लड़के की बहन थी, उन लोगों को स्वाभिमान भरी नजरों से देख रही थी ,तो वही लड़का इस बात से बेखबर अपने काम में मस्त था..!!

    

अपना खेल और सर्कस खत्म करने के बाद दोनों ने पैसे बटोरे, और अपना सामान स्थिर किया और साथ ही साथ खेल देख रहे लोगो को विदा भी किया..!!

शुभम ने भी मुझे वहाँ से चलने को कहा लेकिन ऐसे बच्चों के तरफ मैं बहुत जल्द आकर्षित हो जाता हूं और आज भी यही हुआ।

अर्रे!! ये क्या , इन दोनों के पास बहुत सारे रंग बिरंगे गुब्बारे थे जो शायद बेचने के लिए ही थे।

..........ये तो पता था कि इंसान को ज़िन्दगी में अनेकों किरदार निभाने पड़ते है पर क्या इतनी छोटी सी उम्र में भी??

....ये ज़िन्दगी भी न उफ्फ!! ,अपना पता देती ही नहीं है, हमे खुद ही ढूँढना पड़ता है और शायद वो दोनों भी यही कर रहे थे।


शाम का सूरज ढलने होने को आया था, परिंदों की तरह लोग भी घरो को लौट रहे थे, लेकिन उन दोनों की मुस्कान, झुलवा झूल रहे बच्चों का शोर, ठेले वालों की थकी हुई आवाज़ कुछ हद तक मेले के रौनक को संभाले हुए थे..!!

वह छोटी बच्ची रह रहकर अपने भाई के तरफ देखती और जब इस दौरान उसका भाई उसकी तरफ देखता तो दोनों की हंसी मानो जीवन के हर दर्द को कब्र में दफन करने की ताकत रखती थी..!!

कहते है न, "इंसान को छोटी छोटी चीज़ों में खुशियां ढूँढ़ लेनी चाहिए", शायद इस पंक्ति को ही उन्होंने जीवन का सार बना लिया था।।

जब ज़िन्दगी की कहानियां साथ मिलती है न और जब सभी किरदार एक साथ बात करते है तो ऐसे ही खुशी बिखरती है।

मंजिल का कुछ पता न था, फिर भी वो दोनों चल रहे थे एक बेपरवाह अंदाज में।

सर्कसवाला, गुब्बारेवाला ,एक ज़िम्मेदार इंसान और न जाने कितने किरदारों को अपने अंदर जिंदा किये वो लड़का अपनी बहन को चाट के ठेले के पास ले जाता है, वो दोनों वहाँ चाट खाते है, फिर बड़े भाई होने की जिम्मेदारी निभाते हुए पैसे निकाल कर देता है।

        

अब मेला अपने अंतिम चरम पर था...उधर सूरज को अस्त होने की जल्दी थी और इधर लोगों को घर जाने की। सभी दुकान वाले जाने की तैयारी कर रहे थे, तिरपाल पर बचे खिलौने पैक हो चुके थे, मनिहारी औरतें पैसे गिन रही थी, झुलवे की रफ्तार धीमे हो गयी थी...शोर एकदम से थम चुका था....पर उन दो बच्चों के कदम अभी भी चल रहे थे, उनके पास अभी भी 12 गुब्बारे बेचने को थे। मैंने शुभम से जिद करके उनके पास चलने को बोला,

जब हम वहा गए तो वे दोनों हमें ऐसे देख रहे थे जैसे उनकी निगाहें हमें ही ढूँढ़ रही थी।

मैंने उनसे पूछा- मेला लगभग खत्म हो चुका है, घर कब जाओगे तुम लोग??

उन दोनों ने एक दूसरे को निहारा, फिर लड़के ने बोला, "जब तक गुब्बारे न बिक जाते" इतना कहकर दोनों आगे बढ़ गए।

मैंने शुभम की तरफ देखा, वह मेरी भावनाओं को परख चुका था।.....वह मुझे खींचते हुए ले गया और लड़के से बोला- सारे गुब्बारे कितने में दोगे??

लड़का बोला- पांच का एक है।

शुभम ने उन सारे गुब्बारों को खरीद लिया फिर उसने सारे गुब्बारों को एक साथ बांधकर हवा में छोड़ दिया..!!

इतने सारे रंगीन गुब्बारों को एक साथ उड़ते हुए देखकर सभी मौजूद बच्चे जोर से चिल्लाने लगे, उनके खुशी का ठिकाना न रहा...., दुकान वाले अपना सामान छोड़कर उपर ताकने लगे, मनिहारी औरतें पैसों की गिनती भूल चुकी थी, फेरीवाले ने भी साईकल का स्टैंड लगा दिया।

............सबके चेहरे पर एक अलग ही खुशी दिख रही थी मानो जिस काम के लिए आये वो सफल हो गया हो!!

खत्म हुआ मेले का शोर फिर से जागृत हो चुका था, अगर कोई सबसे ज्यादा खुश था तो वो 8 साल की स्वाभिमानी बच्ची जो हंस-हंसकर खुशी से उछल रही थी, वही वो लड़का मन्द मन्द मुस्कुराये ऊपर टकटकी लगाए था..!!

मैं स्तब्धता से शुभम की ओर देखा, उसने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए स्वीकार सूचक सिर हिलाया, और मैं भी उन दोनों बच्चों के कंधे पर हाथ रखते हुए इस खुशी में शामिल हो गया।

लम्हा बेहद शानदार था, सब कुछ सही चल रहा था, बस एक अजीब सा डर था,

गुब्बारों का आकाश में विलीन हो जाने का..!!


Note- पूरी कहानी पढ़ने के लिए शुक्रिया। आपको और आपके परिवार को ढेरों प्यार


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