PRAMOD KUMAR CHAUHAN

Children Stories Inspirational


4.5  

PRAMOD KUMAR CHAUHAN

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सच्ची नियत

सच्ची नियत

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       बात उन दिनो की है जब हम अपने बचपन का पूरा आनंद लेते हुए भविष्य के सपने बुना करते थे । मेरा एक गरीब मित्र जीवन से संघर्ष कर रहा था मुझे उसके पास जाना, उससे बात करना, उससे मिलने बड़ा अच्छा लगता था । उसकी बातें, काम करने का तरीका, परिश्रम से न घबराते हुए परिवार की सहायता कैसे हो इसकी बारे में सोचते रहना, बड़े होकर परिवार के लिए कुछ बन सकूं , इसके लिए मुझे पढ़ना है ऐसी ही साहस और प्रेरणादायक बाते मुझे उसकी ओर आकर्षित करती थी । 

         मुझे उससे मिलना इसलिए भी अच्छा लगता था कि वह कभी अपनी गरीबी, लाचारी, दया, सहानुभूति के लिए रोना, किसी दूसरे को देखकर दुखी होना की बातें नही करता था । धनवान बच्चों को देख कर कभी भी उसके मन मे उन जैसे जीवन जीने की शैली उसे कभी प्रभावित नहीं कर पाई, ना ही कभी उसने इन लाचारीयों को अपने सामने खड़ा किया । वह तो हमेशा परिश्रम पर भरोसा करता था और उसी को आधार मानकर अपना काम करता था। 

       किसी भी बहाने से मैं दोपहर में उसके पास पहुंच जाता था जब वह मेहनत कर कुछ पैसा कमाने की जुगत लगा रहा होता था । परिस्थितियां उसके विपरीत थी किसी तरह से गुजर बसर हो पाता था लेकिन उसका हौसला देखने लायक था । उसकी ईमानदारी पर किसी को कोई संदेश ना था वह मेहनत कर अपने उज्जवल भविष्य के सपने देखता रहता था ।

         एक दिन जब वह बहुत ज्यादा परेशान और वैचेन था कि उसके घर में शाम के वक्त खाने पीने का कोई सामान ना था उस दिन वह किसी वजह से कमाने भी ना जा पाया तो घर में खाने को भी नहीं था वह बाजार में इस नीयत से गया कि शायद किसी की कोई मदद मिल जाए और आज का काम चल जाए जब वह बाजार के चौराहे पर पहुंचा तो हॉट का दिन था सभी दुकानदार अपना सामान समेट कर घर जा रहे थे वह थोड़ी देर इधर-उधर घूमता रहा कि शायद कहीं कुछ मदद मिल जाए तभी उसकी नजर चौराहे पर एक चमचमाते हुए काले पर्स पर पड़ी उसे कुछ उम्मीद की किरण नजर आई उसने पर्स उठाया उसे खोला उसमें बहुत सारे नोट थे इतने थे कि लगभग आठ से दस दिन तक उसका खर्च चल सकता था। पता नहीं क्यों उसके दिल ने गवारा ना किया उसने पर्स को उलग-पलट कर देखा उसमें पर्स के मालिक की फोटो थी । 

       वह उस मालिक को भलीभांति जानता था वह उसको वह पर्स देने के लिए उसके घर की तरफ चला मगर सौभाग्य से पर्स मालिक करीब की एक दुकान पर बैठे मिल गये । उसने जाकर उनसे पूछा आदरणीय आपका पर्स कहां है , उन्होंने जेब टटोली , इधर -उधर देखा और पर उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें स्पष्ट दिखाई दे रही थी कि कहीं ना कहीं इन्होंने अपने पर्स को खो दिया है और उसमें पैसे भी बहुत ज्यादा हैं, क्योंकि उनके चेहरे के भाव से ये घबराहट स्पष्ट नजर आ रही थी ।

        रोते भाव से बोले लगता है कहीं खो गया है । उसने बिना कोई देरी किये पर्स उनकी तरफ बढ़ा दिया । उन्होंने पर्स देखकर बड़ी प्रसन्नता जाहिर की , वे सज्जन जिन महोदय की दुकान पर बैठे थे उन्होंने कहा इस ईमानदार लड़की को कुछ इनाम दो तो उन्होंने एक पाँच का नोट निकालकर उस मित्र की तरफ बढ़ा दिया । वह बड़ा खुश था क्योंकि उस पाँच रुपये से उसके घर का काम चल जायेंगा। 

       कुछ दिनों बाद जिन सज्जन की दुकान पर पर्स वाले व्यक्ति बैठे थे उस दुकानदार ने मेरे गरीब मित्र की ईमानदारी को देखते हुय उसे कोचिंग पढ़ने को कहाँ जिसका भुगतान ₹15 प्रति दुकानदार द्वारा किया । जिससे उसे काफी मदद मिली और इस तरह से उसके आगे के रास्ते खुलते चले गए । 

        मित्रों इस कहानी के माध्यम से मैं आप सभी को यह बताना चाहता हूं की यदि आपका इरादा और नियत नेक हो तो ईश्वर किसी ना किसी रूप में हम सबकी मदद करता है जिस तरह से उस मित्र की, की इसलिए हमें कभी भी हताश नहीं होना चाहिए अपना इरादा नेक रखते हुए हमेशा आगे बढ़ने की कोशिश करना चाहिए । 



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