नन्हा बादल और शरारती हवा
नन्हा बादल और शरारती हवा
ज़िक्र है कि आसमान की वुसअत में एक नन्हा बादल रहा करता था। वह निहायत ख़ुश-मिज़ाज और थोड़ा सा शोरीदा-सर (शरारती) था। उसे बच्चों के साथ वक़्त गुज़ारना बेहद पसंद था। जब भी बच्चे मैदान में खेलते, वह दबे पाँव उनके सर पर आ ठहरता और अपनी ठंडी छाँव से उन्हें सुकून पहुँचाता।
एक रोज़ उसकी मुलाक़ात एक शौख़ हवा से हुई। हवा ने मुस्कुराकर कहा, “आओ, आज हम छुपम-छुपाई खेलें।” नन्हा बादल फ़ौरन रज़ामंद हो गया। हवा कभी उसे इस सिम्त (दिशा) ले जाती, कभी उस सिम्त उड़ाती। बच्चे तअज्जुब से आसमान की जानिब देखते और मसरूर (प्रसन्न) होते।
अचानक हवा की रफ़्तार ज़रा तेज़ हो गई और बादल घबरा गया। उसने पुकारा, “ज़रा हौले चलो, कहीं मैं मुंतशिर (बिखर) न जाऊँ!” हवा को अपनी लग़्ज़िश (त्रुटि) का एहसास हुआ। उसने फ़ौरन अपनी तुंदी कम की और नर्मी से बहने लगी।
नन्हा बादल फिर से संभल गया और मुसर्रत (प्रसन्नता) में आकर हल्की-हल्की फुहार बरसाने लगा। बच्चे निहाल हो गए और तालियाँ बजाने लगे। उस रोज़ के बाद हवा और बादल ने अहद (वादा) किया कि वे हमेशा बाहम (मिलकर) बच्चों की शादमानी का सबब बनेंगे।
हासिल-ए-क़िस्सा: शोख़ी और शरारत अपनी जगह, मगर एहतियात और रफ़ाक़त (मित्रता) की अहमियत सबसे बढ़कर
है।
