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दिनेश कुमार कीर

Children Stories Inspirational

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दिनेश कुमार कीर

Children Stories Inspirational

मीराबाई...

मीराबाई...

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इतिहास में मीराबाई का नाम बड़े आदर और सत्कार से लिया जाता है। मीराबाई मध्यकालीन युग की एक कृष्ण भक्त कवियित्री थी जिन्होंने श्री कृष्ण को प्राप्त करने के लिए भक्ति मार्ग चुना और हमेशा भजन तथा कीर्तन के माध्यम से श्री कृष्णा को याद किया करते थे। मीराबाई ने बहुत सारे भजन लिखे थे। इन भजनों में मीराबाई ने श्री कृष्ण के विभिन्न रूपों का उल्लेख भी किया है, और श्री कृष्ण की मूर्ति हमेशा अपने साथ रखा करते थे और दिन और रात उसी मूर्ति की पूजा पाठ किया करते थे। 

मीराबाई राणा संग्राम सिंह की पुत्रवधू थी और महाराणा प्रताप से उनका रिश्ता बड़ी माता का होता था। जब मेवाड़ पर अकबर ने 1567 में आक्रमण किया और यह चित्तौड़ का तथा मेवाड़ का तीसरा साका था। इस युद्ध में अकबर ने अनगिनत राज्य के लोगों को मरवाया था उसकी सेना ने राज्य में रह रहे नागरिकों का भी कत्लेआम किया था। इन सभी से महाराणा प्रताप का मन युद्ध तथा ऐसी परिस्थितियों से दूर होने लगा तभी मीराबाई उनको दर्शन देकर समझाते हैं, और महाराणा प्रताप का मनोबल पुनः बढ़ाने का प्रयास करते हैं। जिससे महाराणा प्रताप युद्ध करने का निश्चय करते हैं, और अपनी प्रजा तथा लोगों को न्याय दिलाने के लिए अकबर से युद्ध करने के लिए सेना को संगठित करतेे हैं, और अपने प्रदेश को आजाद रखने का प्रयत्न करते हैं। जिसमें उनको सफलता मिल जाती है... 


मीराबाई का प्रारंभिक जीवन :-

मीराबाई का जन्म मेड़ता के शासक रतन सिंह राठौड़ के घर हुआ था मीराबाई उनके माता-पिता की इकलौती संतान थी, और मीराबाई के जन्म के कुछ वर्षों बाद उनकी माता का देहांत हो गया था। उनकी माता के देहांत के बाद मीराबाई के दादा राव दूदा राठौड़ मीराबाई को अपने पास ले आते हैं और उनका लालन-पालन करते हैं राव दूदा राठौड़ भगवान विष्णु के उपासक थे और उनकी उपासना दिन और रात किया करते थे जब वे उपासना करते थे तो मीराबाई भी उनको देखकर प्रभावित हुई और मीराबाई भक्ति भाव तथा पूजा पाठ करनेे लगे मीराबाई उनकी माता की दी हुई श्री कृष्ण की मूर्ति की पूजा पाठ करने लगे थे राव दूदा राठौड़ एक योद्धा भी थे जिन्होंने विभिन्नन सैन्य अभियान में भाग लिया था और एक विष्णु भक्त उपासक भी थे इस कारण उनके महल के आसपास साधु-संतों का आना-जाना लगा रहता था और उनके साथ भजन कीर्तन किया करते थे इन सभी को देखकर मीराबाई भी बाल्यावस्था से ही तथा नए भजन लिखने लगे और उन्हें गाने भी लगे थे राव दूदा राठौड़ ने मीराबाई को बाल्यावस्था से तलवारबाजी घुड़सवारी तथा युद्धध करने की विभिन्न पद्धतियोंं से अवगत करवाया था तथा इने परीक्षण भी दिया था... 


मीराबाई का विवाह :-

मेवाड़ के महाराणा संग्राम सिंह ने अपने बड़े पुत्र भोजराज का रिश्ता मेड़ता के शासक रतन सिंह राठौड़ की पुत्री मीराबाई से करने का प्रस्ताव भेजा और इस प्रस्ताव को मेड़ता के शासक रतन सिंह राठौड़ ने स्वीकार किया और इसके बाद मीराबाई और कुंवर भोजराज का विवाह सांस्कृतिक रीति रिवाज से संपन्न हो जाता है विवाह के 10 वर्षों के बाद कुंवर भोजराज की मृत्यु हो जाती है और पति की मृत्यु के बाद ही उनके ससुर महाराणा संग्राम सिंह जो इतिहास में राणा सांगा के नाम से भी प्रसिद्ध है उनकी भी मृत्यु खानवा के युद्ध में 1527 में मुगल अक्रांता बाबर के विरुद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं इसके बाद राणा सांगा के दूसरे पुत्र रतन सिंह मेवाड़ के महाराणा बनते हैं लेकिन 1531 में उनकी भी मृत्यु हो जाती है इसके बाद विक्रमादित्य को मेवाड़ का महाराणा बनाया जाता है मीराबाई अपने श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन थी और दिन और रात साधु संतों के साथ भजन करना और भगवा वस्त्र धारण करके साधु साध्वीयों के साथ यात्रा पर जाना यह सब देख कर विक्रमादित्य ने अपनी बहन को मीराबाई को समझाने के लिए कहा परंतु मीराबाई ने उनकी बात नहीं मानी और वे इसी तरह पूजा पाठ तथा भजन कीर्तन और यात्रा पर जाना यह सब लगातार करने लगे थे इसके बाद 1533-34 के आसपास राव वीरमदेव राठौड़ मीराबाई को मेड़ता ले आते हैं और जैसे ही मीराबाई मेवाड़ को छोड़कर मेड़ता पहुंचते हैं तो पीछे मेवाड़ पर संकट के काले बादल छा जाते हैं... 


मेवाड़ पर संकट आना :-

मीराबाई राव वीरमदेव राठौड़ के प्रस्ताव पर मेवाड़ छोड़कर मेड़ता चले जाते हैं और मेड़ता पहुंचने पर उनका भव्य स्वागत किया जाता है और उनके लिए भजन कीर्तन कार्यक्रम का आयोजन भी किया जाता है और दूसरी तरफ 1534 में गुजरात के शासक बहादुर शाह मेवाड़ पर आक्रमण कर देता है इस आक्रमण में मेवाड़ के शासक विक्रमादित्य वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं और राजमाता कर्मावती के नेतृत्व में हजारों की संख्या में क्षत्राणीया जोहर करते हैं यह मेवाड़ का दूसरा साका था और मेवाड़ की प्रस्तुतियां और भी कठिन होती जा रही थी मेड़ता से मीराबाई भगवान कृष्ण की नगरी की यात्रा करने के लिए निकलते हैं मीराबाई के मेड़ता से चले जाने के बाद जोधपुर रियासत के शासक राव मालदेव राठौड़ मेड़ता पर अधिकार कर लेते हैं और मेड़ता के शासक वीरमदेव राठौड़ मेड़ता को छोड़कर अजमेर की तरफ चले जाते हैं मीराबाई द्वारिका में श्रीकृष्ण की भक्ति में साधु संतों के साथ भजन कीर्तन करते हैं... 


कृष्ण भक्ति में लीन मीराबाई :-

मीराबाई द्वारिका में श्रीकृष्ण की भक्ति में भजन कीर्तन करते हैं और साधु संतो के साथ वन वन भटकते हैं और ईश्वर को प्राप्त करने की चेष्टा में भारत के विभिन्न मंदिरों की यात्रा करते हैं यह सब समाचार सुनकर मेवाड़ के राजपरिवार को अच्छा नहीं लगने लगा इसलिए उन्होंने कुछ ऐसे प्रयत्न किए परंतु इनमें सफलता नहीं मिली जब मेवाड़ के शासक महाराणा उदयसिंह बनते हैं तो उदय सिंह इतिहास में घटी हुई परिस्थितियों को समझते हैं और अपने परिवार तथा सगे संबंधियों से कहते हैं कि मेवाड़ की स्थिति इतनी खराब हुई इसके पीछे एक मात्र कारण हम लोग ही है क्योंकि हमने एक ईश्वर रूपी देवी का अपमान किया है इस कारण हमारी रियासत पर इतने सारे संकट आए हैं और इसके बाद महाराणा उदय सिंह आदेश देते हैं और साधु-संतों तथा मंत्रियों को कहते हैं कि आप सह सम्मान से मीराबाई को वापिस मेवाड़ लेकर आए इसके बाद ब्राह्मण तथा कुछ मंत्री मीरा बाई को लाने के लिए चले जाते हैं जब वे द्वारका पहुंचते हैं तो मीराबाई से कहते हैं कि हमें माफ कर दीजिए आप दोबारा मेवाड़ चलिए हमारे साथ लेकिन मीराबाई मना कर देते हैं परंतु ब्राह्मण तथा कुछ मंत्री जिद पर बैठ जाते हैं और कहते हैं कि जब तक आप हमारे साथ नहीं चलेंगे तब तक हम भी यहां रुकेंगे फिर मीराबाई कहते हैं के आज कृष्णा जन्माष्टमी के उत्सव की तैयारी चल रही है इस तैयारी में सभी लोग थे और मीराबाई कहते हैं कि अगली सुबह मैं आपके साथ मेवाड़ चलूंगी तब सभी ब्राह्मण तथा मंत्री खुश हो जाते हैं और कृष्ण जन्माष्टमी के उत्सव में शामिल हो जाते हैं उत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा था भजन कीर्तन तथा ढोलक शहनाई की गूंज सुनाई दे रही थी तभी अचानक मीराबाई मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश करती है और मंदिर के कपाट बंद कर देती है जब ज्यादा समय के बाद पुजारी ने कपाट खोले तो देखा मीराबाई गर्भ ग्रह में नहीं थी अर्थता मीराबाई मूर्ति में समाहित हो चुके थे... 


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