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Arun Singh

Others

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Arun Singh

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मैं का सिक्का

मैं का सिक्का

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मैं का सिक्का बहुत पहले उछाला था और फिर भूल गया। आज बरसों बाद वो ज़मीन पर गिरा तो उसकी आवाज़ से जीवन जीने का भ्रम टूटा है। याद आया है वो फैसला जो उस सिक्के को उछालने के परिणाम पर टिका था- और जिसे भूल गया हूं। आँख बंद करके उस सिक्के को छूता हूँ। सिक्के का एक पहलू भीगा है अतीत की ओस में और एक पहलू भविष्य की धूप में गर्म है। मैं दोनों को नजरअंदाज करके वर्तमान की जेब में डालकर सीटी बजाते हुए घर से निकल जाता हूँ। बहुत देर तक मैं का सिक्का जेब के सिक्कों से टकराकर 'कायर' की ध्वनि गुंजाता रहता है।


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