मां कालरात्रि
मां कालरात्रि
नव दुर्गा में सातवीं हैं ,*कालरात्रि*।
पौराणिक कहानी के अनुसार एक बार शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज नाम के राक्षसों ने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था। इन तीनों राक्षसों के हाहाकार से परेशान होकर सभी देवतागण महादेव के पास गए और उनसे इस समस्या से बचने का कोई उपाय मांगने लगे।
तब भगवान शिव ने माता पार्वती से इन राक्षसों का वध करने के लिए कहा। उनकी बात सुन माता पार्वती ने दुर्गा का रूप धारण कर शुंभ-निशुंभ का वध कर दिया।
लेकिन जब रक्तबीज के वध की बारी आई तो उस पर खड़ग चलाते ही उसके शरीर से निकले रक्त से लाखों की संख्या में रक्तबीज दैत्य उत्पन्न हो गए। क्योंकि रक्तबीज को यह वरदान मिला था कि यदि उनके रक्त की बूंद धरती पर गिरती है तो उसके जैसा एक और दानव उत्पन्न हो जाएगा।
ऐसे में माता दुर्गा ने इस मायावी दैत्य को मारने के लिए अपने तेज से देवी कालरात्रि को उत्पन्न किया। इसके बाद मां दुर्गा ने दैत्य रक्तबीज का वध किया और मां कालरात्रि ने उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुख में भर लिया। इस तरह रक्तबीज का अंत हुआ।
इन्हें मां काली भी कहा जाता है।
माँ कालरात्री का वर्ण रात्रि के समान काला है परन्तु वे अन्धकार का नाश करने वाली हैं । दुष्टों और राक्षसों का अंत करने वाला माँ दुर्गा का यह रूप देखने में अत्यन्त भयंकर लेकिन शुभ फल देता है । इसलिए आप " माँ शुभंकरी " भी कहलाई जाती हैं । माँ कालरात्रि की पूजा-अर्चना करने से आकस्मिक संकटों से रक्षा होती है । माँ कालरात्रि की आराधना करने से भूत , प्रेत या बुरी शक्तियों का भय जीवन में कभी नहीं सताता है । माँ कालरात्रि के ब्रह्माण्ड के समान गोल नेत्र हैं । अपनी हर श्र्वास के साथ माँ की नासिका से अग्नि की ज्वालाएं निकलती रहती हैं । अपने चार हाथों में खड्ग ( तलवार ) , लोहे का अस्त्र , अभयमुद्रा और वरमुद्रा किये हुए माँ अपने वाहन गर्दभ ( गदहा ) पर सवार हैं ।
जय माता दी
