एक यात्रा
एक यात्रा
पृथी शर्मा आज बहुत खुश थे। वे लंबे समय से दिल्ली के एक सरकारी विद्यालय में अध्यापक के पद पर कार्यरत थे और परिवार से दूर दिल्ली में रह रहे थे। आज वे अपने पद से सेवानिवृत्त होकर हमेशा के लिए अपने परिवार के साथ रहने हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जा रहे थे। वैसे तो वह अकसर अपने परिवार से मिलने जाते थे, लेकिन आज उनके मन में अलग ही भाव उमड़ रहे थे। उन्हें बार-बार गाँव का अपना घर, खेत-खलिहान, पुराने दोस्त, रिश्ते-नातेदार सभी याद आ रहे थे। उनके साथियों ने उन्हें विदाई समारोह में अनेक उपहार दिए थे, जिनमें एक बहुत ही सुंदर कलम भी थी।
पृथी जी को कविता, कहानी आदि लिखने का बड़ा शौक था। वह अकसर अलग-अलग विषयों पर कविता, कहानियाँ लिखते रहते थे। उनके मन में हमेशा ये इच्छा रहती थी कि लोग उनकी रचनाएँ सुनें और प्रशंसा करें। आज जब उनके साथियों ने उन्हें 'उम्दा लेखक’ की संज्ञा देते हुए कलम भेंट की, तो वह भाव-विभोर हो उठे थे।
वे अपने घर हिमाचल रोडवेज़ की बस से जा रहे थे। बस में बैठकर भी वे बार-बार उस कलम को देख रहे थे। अचानक उनकी नज़र अपनी बगल की सीट पर बैठे एक लड़के पर पड़ी। लड़के की उम्र चौदह-पंद्रह वर्ष रही होगी। उस लड़के ने मैले-कुचैले कपड़े पहने हुए थे। उसे देखकर उनके मन में कुछ संशय उत्पन्न हुआ और वे सतर्क होकर बैठ गए।
लेकिन थोड़ी देर बाद ही उन्होंने लड़के से उसके बारे में पूछा। लड़के ने बताया कि वह काफ़ी गरीब है और पेट पालने के लिए हमीरपुर में एक हलवाई की दुकान पर काम करता है। उसकी माँ गाँव में रहती है। लड़का बातचीत करने में काफ़ी तेज था, लेकिन उसकी स्थिति को जानकार पृथी जी थोड़ा दुखी हो गए। वे लड़के से बातें करते रहे, उन्हें उसके साथ बातें करने में मज़ा आने लगा था। वहीं बातें करते-करते लड़के की नज़र बार-बार उनकी कलम पर चली जाती थी। उसने पृथी जी से कलम देखने के लिए माँगी, लेकिन उन्होंने मना कर दिया।
लगभग दो-ढाई घंटे के सफर के बाद बस एक ढाबे पर रुकी। सभी यात्री रात का भोजन करने के लिए बस से उतरे। पृथी जी भी भोजन करने के लिए उतरने लगे, तभी उन्होंने उस लड़के को अपने साथ भोजन करने को कहा, लेकिन लड़के ने मना कर दिया। उन्हें लगा कि लड़का बड़ा ही खुदगर्ज है। इसके बाद वे खाना खाने ढाबे की ओर चले गए।
थोड़ी देर में खाना खाने के बाद सभी यात्री वापस बस में आ गए, बस चलने को तैयार थी। पृथी जी भी बस में आ गए, लेकिन ये क्या, उनका सामान तो सीट पर रखा था, पर उनकी कलम नहीं थी। उन्होंने इधर-उधर देखा, तो वह लड़का भी नहीं था।
पृथी जी अपनी कलम को ढूँढ़ते हुए बहुत परेशान तथा क्रोधित हो रहे थे। उन्हें पूरा विश्वास हो गया था कि वही लड़का कलम लेकर चला गया है। बस चलने लगी, तभी लड़का दौड़ता हुआ बस में चढ़ा। उसे देखते ही पृथी जी चिल्लाने लगे, “मेरी कलम कहाँ है, तुम्हीं ने ली है।” लड़के की आँखों में आँसू आ गए। उसने रोते हुए कहा, ''अंकल जी! मैं गरीब हूँ, ज़रूरतमंद हूँ, लेकिन चोर नहीं हूँ।” सभी उस लड़के की ओर देखने लगे।
अचानक किसी के सामने आने के कारण ड्राइवर ने बस की ब्रेक लगाई, ब्रेक लगते ही कलम सीट के नीचे से लुढ़कते हुए बाहर आ गई। पृथी जी कलम को देखते ही सन्न रह गए, उन्हें अपनी गलती पर पछतावा होने लगा और वह उस लड़के की ओर चुपचाप देखने लगे। इसी बीच टिकट कंडेक्टर आया और टिकट माँगने लगा। लड़के के पास टिकट नहीं थी और न ही टिकट लेने के लिए पैसे।
कंडेक्टर उसे बिना टिकट यात्रा न करने की बात कहते हुए डाँटने लगा, तभी पृथी जी बीच में बोल पड़े, “ये मेरे साथ है। इसकी टिकट के पैसे आप मुझसे ले लीजिए।” इसके बाद उन्होंने कलम लड़के के हाथ में दे दी और कहा, ''यह तुम्हारे लिए है। इसकी ज़रूरत मुझसे ज़्यादा तुम्हें है। क्या तुम पढ़ने के लिए स्कूल जाओगे।” उनकी बात सुनकर लड़के की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन ये आँसू खुशी के थे।
