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गुरप्रीत शर्मा

Children Stories Others Children

4.5  

गुरप्रीत शर्मा

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धागे से बँधी उड़ान

धागे से बँधी उड़ान

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बचपन के दिनों की बात है। वह समय जब मन बहुत सरल, निश्छल और कोमल हुआ करता था। तब न किसी तरह की बड़ी ज़िम्मेदारियाँ थीं और न ही भविष्य की चिंताएँ। छोटी-छोटी बातों में ही हमें अपार खुशी मिल जाती थी। हमारे लिए पूरी दुनिया बस घर, आँगन और गली तक ही सीमित थी। आँगन में खेलना, गली में दौड़ लगाना और शाम को माँ की आवाज़ पर घर लौट आना—यही हमारा रोज़ का जीवन था।

एक दिन दोपहर के समय हम आँगन में खेल रहे थे। धूप हल्की-हल्की चमक रही थी और आम के पेड़ की छाया ज़मीन पर अजीब-सी आकृतियाँ बना रही थी। तभी माँ की आवाज़ आई, “ज़रा इधर आओ, देखो क्या आया है।”

हम दौड़ते हुए माँ के पास पहुँचे। आँगन के एक कोने में एक छोटा-सा चिड़िया का बच्चा बैठा था। उसके पंख अभी पूरे नहीं खुले थे। वह बार-बार उड़ने की कोशिश करता, लेकिन थोड़ी दूर जाकर फिर नीचे गिर जाता। उसकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था। वह सहमा हुआ था, जैसे इस अनजानी जगह में खुद को अकेला महसूस कर रहा हो। शायद वह अपने घोंसले से गिर गया था या उड़ना सीखते हुए रास्ता भटक गया था।

हमने उसे बहुत धीरे से और सावधानी पूर्वक उठाया। वह हमारे हाथों में आते ही घबरा गया और जोर-जोर से फड़फड़ाने लगा। उसकी नन्ही-सी धड़कन हमें अपनी हथेली में महसूस हो रही थी। उस पल हमारे मन में उसके लिए अजीब-सा अपनापन जाग उठा। मैंने और मेरे भाई ने तय किया कि हम उसकी देखभाल करेंगे। माँ ने भी सहमति में सिर हिला दिया।

माँ ने बहुत धैर्य से उसे खाना सिखाया। वे केले के छोटे-छोटे टुकड़े उसकी चोंच में देतीं और उसका सिर झुका-झुकाकर उसे खाना सिखातीं। हथेली पर पानी की कुछ बूँदें रखकर उसे पिलातीं। शुरू में वह डर के मारे कुछ खाता ही नहीं था। कई बार चोंच खोलकर फिर बंद कर लेता। लेकिन माँ की नरम आवाज़ और हमारे प्यार भरे व्यवहार से धीरे-धीरे उसका डर कम होने लगा। कुछ ही दिनों में वह हमें पहचानने लगा।

धीरे-धीरे वह थोड़ा उड़ने लगा। कभी कमरे में इधर-उधर उड़ता, कभी खिड़की पर बैठकर बाहर झाँकता। उसकी हल्की-सी चहचहाहट से हमारा घर मानो जीवंत हो उठता। सुबह उसकी आवाज़ से नींद खुलती और शाम को उसके आस-पास बैठकर हम उसे देखते रहते। दादी उसे देखकर मुस्करातीं और कहतीं, “यह भगवान का भेजा हुआ नन्हा मेहमान है, इसे खूब प्यार देना।”

पड़ोस के बच्चे भी उसे देखने आते। कोई उसे दाना देना चाहता, तो कोई बस उसकी उड़ान को देखकर खुश हो जाता। धीरे-धीरे वह खुद से खाना खाने और पानी पीने लगा। हमें लगने लगा कि वह हमारे परिवार का हिस्सा बन गया है। अगर वह सुबह दिखाई दे जाता, तो हमारा पूरा दिन अच्छा बीतता।

लेकिन इस खुशी के साथ-साथ हमारे मन में एक अनजाना-सा डर भी पलने लगा। हमें लगता था कि जिस दिन उसके पंख पूरी तरह मजबूत हो जाएँगे, वह उड़कर कहीं चला जाएगा। हम उसे खोना नहीं चाहते थे। उसी डर में एक दिन मेरे छोटे भाई ने उसके पैर में एक पतला-सा धागा बाँध दिया। उसका कहना था, “ऐसा रहेगा तो ये यहीं रहेगा, कहीं दूर नहीं जाएगा।”

उस समय हमें यह बात गलत नहीं लगी। हमें लगा कि हम उसकी सुरक्षा कर रहे हैं। कुछ दिनों तक वह धागे के साथ उड़ता रहा। लेकिन अब उसकी उड़ान वैसी नहीं रही थी। वह पहले जितना ऊँचा और खुलकर नहीं उड़ पाता था। कभी-कभी धागा किसी चीज़ में उलझ जाता और वह घबरा जाता। शायद वह यह बंधन समझ नहीं पा रहा था या फिर चुपचाप सह रहा था।

फिर एक सुबह ऐसा हुआ, जिसने हमें अंदर तक तोड़ दिया। उठते ही हमने देखा कि वह कहीं नहीं था। न वह दिखा, न उसके पैर का धागा। हमने पूरा घर छान मारा— आँगन, छत, कमरे, यहाँ तक कि अलमारियों के पीछे भी झाँका। फिर हम गली, पास के पेड़ और खाली प्लॉट तक खोजते रहे। उसकी चहचहाहट सुनने की बहुत कोशिश की, लेकिन चारों ओर सन्नाटा था।

हम सब बहुत दुखी हो गए। माँ कुछ नहीं बोलीं, बस चुपचाप बैठी रहीं। मेरे भाई की आँखों में आँसू थे और उसके चेहरे पर गहरा पछतावा। घर अचानक सूना लगने लगा। वह छोटी-सी चिड़िया हमारे जीवन में जो रौनक लाई थी, वह उसके साथ ही चली गई थी।

उसी दिन मुझे एक बात गहराई से समझ में आई। वह चिड़िया हमारी नहीं थी। वह एक आज़ाद पक्षी थी। उसका असली घर आसमान था, न कि हमारा आँगन। हमने उसकी मदद की थी, यह सही था, लेकिन उसे बाँधना गलत था। धागा बहुत पतला था, लेकिन उसने उसकी आज़ादी छीन ली थी।

उस दिन हमने तय किया कि आगे से कभी किसी पशु या पक्षी को पालकर उसकी स्वतंत्रता नहीं छीनेंगे। अगर कोई घायल या असहाय पशु-पक्षी मिलेगा, तो हम उसकी पूरी मदद करेंगे, लेकिन ठीक होने पर उसे उसकी दुनिया में भेज देंगे।

 वह छोटी-सी चिड़िया हमारे जीवन से चली गई, लेकिन एक बहुत बड़ी सीख दे गई— सच्चा प्यार वही है, जिसमें बंधन नहीं, बल्कि आज़ादी बनी रहे।


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