एही ठंइयन मुनरी हेरानी हो रामा
एही ठंइयन मुनरी हेरानी हो रामा
मंगल पहलवान मार फरुआ, मार फरुआ नाली खोदे जा रहे थे। सुमेर उनके पीछे दनादन फरुआ चला रहे थे। उनके पीछे मदन, मदन के पीछे झिनक।
अब किस-किस का नाम गिनाऊँ, पूरा गाँव फरुआ लिये मुन्नी फुआ की मुनरी खोजने के लिए आँगन से लिए पोखरे तक खुदाई अभियान में पसीना बहा रहा था। टोले के छोटे लड़के नाली के कीचड़ को हाथ से हटा-हटा कर मुनरी खोज रहे थे। आज किसी को नाली में बहते गू-मूत का ख्याल नहीं था। बरसात का दिन, लड़कियाँ हगनहटी में तब्दील कच्ची सड़क के दोनों तरफ ओढ़नी से नाक दबाए...पच्च-पच्च थूकती मुनरी खोज रही थीं। जैसे सेर पाव मछरी के लिए लड़के खेत में लगे पोखरे के पानी को उदकते हैं, नाली उदकी जा रही थी। सबकी देह कीचक। माटी से भक्क-भक्क बक्सा रही थी। पूरा गाँव सुलेमपुर उदकी नाली की पानी से गंधा रहा था। आज जैसे सबने कसम खा ली थी कि लंका दहन करके ही दम लेंगे।
हेsssलइकों! अइसे काम नहीं चलेगा बुझाता है हमको। जाल डाल कर गड़ही को छानना पड़ेगा। मंगल यादव हांफते हुए फरुआ रख कहने लगे तो सबने हामी भरी। बेचारे थक कर चूर। भारी भरकम शरीर पर बंधी धोती जिसके नीचे आज जल्दी में लंगोट बाँधना भूल गये थे पसीने से चिपक कर पारदर्शी अन्दर बाहर सब देह का अंगप्रदर्शन कर रही थी। कोई और दिन होता और मंगल ऐसे मिलते मुन्नी फुआ तीनों लोक की बेशर्मी का सबूत दे चुकी होतीं गाँव भर को। गाँव भर छोड़िए, कई गाँव खबर फेरी वालों के मुँह बेच आतीं। पर आज मुनरी का सवाल था।
दुवार पर खटिया पर मुँह गिराए मुन्नी फुआ का कलपना जारी था ...ना जाने कौने महूरत में चले घर से ...पहिले टरेन छूटी फिर रस्ते में पिंकुवा के गोड़ में घाव लगा ....फिर रेक्शावाला एढ़ा कह डेढ़ा दाम ले गया और आज त बजरे गिर गया ...पूरे डेढ़ भर की मुनरीsssss...अssssरेsss माई रे माई। उनका रोना चल ही रहा था कि मंगल के कान में झन्न से डेढ़ भर की आवाज गया। किसी से खैनी मांग, मुँह में दबा फट से गमछी की पगड़ी बाँध फरुआ कान्ही पर लिए पोखरे की ओर चले ...पीछे-पीछे लछमन, झिनक, सुमेर, मदन और टोले भर के लड़कों की बानरी सेना...जैसे आज लंका विजय होकर रहेगी का गगन भेदी नारा...लड़के जय श्री राम ...जय श्री राम का जयकारा लगाते चल रहे थे। इन दिनों गाँव में राम नाम पर जोर कुछ ज्यादा ही था।
अब जबर समस्या यह थी की जाल कहाँ से आए....सोच विचार के बाद झिनक ने राय दी कि धोतियों को जोड़ कर जाल बनाई जाए...झट पट जाल बन कर आ गयी....चार गबरू जवान लबालब भरे पोखरे में उतरे... समुद्र मंथन शुरु हुआ ....पहली डुबकी में जो चीजें जाल में फंसकर बाहर निकलीं, का प्रदर्शन आरम्भ करते हुए मदन पंड़ी जी ने लड़कों को एक तरफ खड़े रहने का आदेश दिया.....परदा हटा....एक लकड़ी की टूटी हुई गाड़ी...कुछ प्लास्टिक की गेंदे...एक प्लास्टिक की ड़ाली जैसी चीजों पर जिनकी दावेदारी रही जन समर्थन को ध्यान में रख कर ईमानदारी से बांट दिया गया।
अगली बार जाल थोड़ी गहराई में उतारी गई... खींचते वक्त काफी भारी हो गयी ...लोग बढ़ाए गये ...कौतूहल बढ़ा ...लोग आँख गड़ाए, मुँह बाए टकटकी लगाए थे...। जाल खींच कर बाहर किया गया ...परदा हटा, ...पहले तो दो विशाल साँप फुफकारते आगे बढ़े....लोग पछोटा बान्ह इधर-उधर भागे.....पर रणबांकुरे मदन और सुमेर कसम खा चुके थे कि आज वारा न्यारा करके रहेंगे। सामने एक बुजुर्ग की लाठी छीन सुमर एक साँप पर टूटे तो मदन ने फरुवे से ही दूसरे का काम तमाम कर दिया। सबने राहत की साँस ली और सामने निकली सामग्री का प्रदर्शन शुरु हुआ। सबकी आँखें साईकल पर जा टिकी ...कई दावेदार निकले....कोहराम मच गया, ....पिंटुवा ...दाँत पीसते, मुट्ठी ताने...टुनटुनवा पर टूट पड़ा...पटक कर छाती पर सवार हो गया...थूथुन पर दनादन घूसा बरसाने लगा....सारेssss तूने ही बबुआ की साइकिल पोखरा में बोरा था...हम जानते थे सारेsss, हरामखोर
मदन भागकर लड़कों की जुत्मजुत्थी छोड़ाने लगे....टुनटुन भी कम न था....का सबूत है बेss, की साईकल तुम्हारी है। लड़का ललकारते हुए पिंटुवा पर टूट पड़ा। पीछे से कुछ जवान मनचले ताल ठोंक, मजा ले रहे थे...
बाह शेर!....अरे मार सारे केss...बाह भाई खाया तो है जम के....
मंगल अब तक तमाशा देख रहे थे...मारे क्रोध के सिटकुन ले लड़कों को दो -दो जड़ छुड़ा कर अलग किया। दोनों उनके परिवार के लड़के थे....सच्चाई यही थी कि मारे डाह के टुनटुन ने एक शाम बचकानी साइकिल जिस पर पिंटुवा उसकी छोटी बहन को बैठने नहीं देता था, एक शाम अन्धेरा घिरते पोखरे में ईंटा बान्ह बोर गया था...। फैसला हुआ...न्याय दया का दानी...पिंटुवा रोता- गाता टुटही साइकिल के अस्थिपंजर समेट घर चला गया....औरतों का युद्ध अभी शेष था। खैर मामला आगे बढ़ा....कुछ भुलाई भटकी छोटी -छोटी चीजें फिर बटी....पर जो अहम था वह था मछरी... इस बार सिधरी ढ़ेर फँसी थीं...लड़के मचल रहे थे...मंगल ने तय किया, पोखरा उनके खानदान का है सो मछरी उन्हीं के परिवार में बंटेगी....भर दउरी सिधरी...नाप जोख कर बंट गयी ...किशोर जवान लड़के मतलब की चीज पा सरक लिए....धीरे -धीरे अन्धेरा घिरते देख औरतें भी घरों को लौटने लगीं। झिनक ने दबी जबान में मंगल से कहा....मुनिया फुआ कहती है डेढ़ भर की मुनरी पर लाख रुपये का हीरे का नगीना है...माने कुल लगभग एक लाख चालीस हजार से ऊपर का...
मदन फुसफुसाए...हैं तो...
सुमेर मंतव्य ताड़ दोनों का चेहरा निहारते रहे।
मंगल कोंछी से खैनी निकाल हथेलियों पर रगड़ते खड़े हो गये....दो चार लोग बचे थे दर्शक के रुप में, ...हे भाई!...आप लोग भी जाइए...अब कल खोजाएगा....देह टूट रहा है। लोग उठ कर चल दिए। चारों तब तक मौन धरे जाते हुए लोगों को निहारते रहे तब तक, जब तक आँखों से ओझल नहीं हो गये।
सन्नाटा पा चारों ने तय किया कि जिसे मिलेगी बेच कर चारों आपस में बांट लेंगे। छपाक से चारों माटी सनायी गढ़यी में कूद पड़े ...घण्टे भर तली में हाथ डाल-डाल उदहते रहे पर मामला वही ढ़ाक के तीन पात ...हार कर चारों मटियाई देह लिए ट्यूब बेल की ओर चले, ...सन्देह सबके मन में था कि किसी न किसी को तो मिली ही होगी। आखिर नाली आकर यही खत्म होती है ...जाएगी कहाँ, सभी मौन, ट्यूब बेल चालू कर नहाने लगे ...सबने पहले गमछा कचार कर लपेटा और जांघिया, धोती खोल फींच कर घास पर पसार, मल-मल कर नहाया। कपड़ा झार सभी बिन कहे ईमानदारी का सबूत देना चाहते थे। मंगल सोच रहे थे, ..चोरा कर रखेंगे कहाँ सारे, जरूर वहीं कहीं लुका दिया होगा। देखता हूँ कैसे ससुर लोग अकेले डकारते हैं और विदा ले अपने अपने घर को चले गये। रात में खा पी कर पोखरे पर आ डटे। सामने के रहर के खेत में निशाना साध बैठ गये...अजोरिया रात में पोखरे का चारों किनारा साफ दिख रहा था। बेचारे रात भर बिन पलक झपकाए ताकते रहे पर हाथ कुछ नहीं लगा।
तीनों अपने-अपने दुवार पर टांग पसारे मारे थकान के बेसुध पड़े थे। इधर मुन्नी फुआ को घेर कर घर भर की लड़कियाँ औरतें छत पर बैठी थीं। चुन्नी फुआ बहन की चापलूसी में कौंनो कसर नहीं छोड़ना चाहती थीं ...कारण बहन का बेटा बड़ा हाकिम हुआ था और उनके दो लखैरे लड़के घर में बैठ कर मक्खी मार रहे थे, कौनों जुगाड़ बइठ गया तो कुछ न कुछ काम लगा ही देगा। ...आँवला का ठण्ड़ा तेल एक चुरुआ ले बहन के सर पर लगा जांतने लगीं। छोटी भौजाई पैर पर लपट गयी...चर्चा चल रही थी कि अब क्या हो ...आखिर मुनरी पतोहू की थी...फुआ क्या जवाब देंगी, नैहर में लोग कहेंगे कि कौनों सोए में काढ़ ली, आदि तर्क उछल रहे थे। दयादी बड़ी बुरी चीज होती है, मुन्नी फुआ की छोटी भौजाई जेठानी के बेटे के बियाह का जलसा देख पहले से डह रही थीं...इस बड़ी विघ्न से कलेजा जुड़ा गया...टपाक से मजमा बटुरा देख बोल पड़ी ....हमारे भईया के बियाह में फुआ का सिकड़ी हेरा गया था....पूरे दू भर का, आँख नचा कर....बाबूजी अम्मा का सिकड़ी उतार कर दे दिए....आखिर डाढ़ त उ हे भरेगा जो बुलाया है। झनक कर खड़ी हो गयीं...आ कायदा से नियम त इहे है कि बड़की जानी डाढ़ भरें, ...कह दनदनाती हुई नीचे भाग गयीं...तीर निशाने पर लगा था... अग्नि बाण, बड़को बिन पानी मीन सी तड़फड़ा उठीं, ...जानती थीं बात पति के कान तक जाने की देर थी, ....झट उनकी अंगुरी से निकाल मुनरी बहन के आँचल में डाल देंगे। औरतों में खुसुर फुसुर होती रही। बेचारी बड़को रात भर मारे ग़म के सो न सकीं।
सुबह अजोर होते खुद आँगन में उतरीं...एक बार फिर खोजाई शुरु हुई...इस बार आँगन से पोखरे तक महिला मण्डल डटा था....बेटियाँ माँ का दर्द समझती थीं...जान देकर भिड़ी थीं...बड़की की दोनों बेटियाँ सुमन और किरन आपस में बतिया रही थीं....सुमन ...सेतिहा का पियर्स साबुन पाई थीं तो लगीं मलवठ-मलवठ नहाने।
किरन...देखें हैं हम भी फुआ को बालू से मइल छोड़ाते, जब इनकी बड़की बेटी के बियाह में गये थे। बेटा साहब सुब्बा का हुआ देखाने के लिए हीरे क मुनरी पहिन के चली आईं।
सुमन उदास होकर ...कच्छों कहो बुचिया, ...नहीं मिला तो माई को डाढ़ भरना पड़ेगा।
दोनों लड़कियों ने बरह्म बाबा को दूध बताशे की मनौती मानी और नाली में हाथ डाल -डाल खोजने लगीं। इस अभियान को देर से टोले के एक बुजुर्ग देख रहे थे। अन्त में बोल पड़े....ए कुल से कौनों फायदा नहीं...कच्ची नाली में एतना लोग कल से लाते -लाते उदह रहे हैं कि मुनरी धरती में चली गयी होगी। सुनते सभी लोग जैसे जहाँ के तहाँ जड़ हो गये....बड़की भौजी सुनते बेहोश हो गयीं...औरतें भाग कर पानी लाईं...कोई नाक दबाने लगा तो कोई पानी का छींटा मुँह पर मारने लगा...मिनट भर बाद बेचारी को होश आया।
शाम को दरवाजे पर टोले भर की बैठकी लगी....मुनरी हेराना इस वक्त गाँव की सबसे बड़ी राष्ट्रीय समस्या थी। सबके विचार रह- रह कर आ रहे थे...
मदन....मुन्नी फुआ को पतोहू का मुनरी पहन कर आना ही नहीं चाहिए था।
झिनक बीच में ही टपक पड़े....हे हे हे....फुआ का नहीं, सुना है पियर्स साबुन से नहा रही थीं जो बबुआ मिलेट्री कैंटीन से लाया था....ससुरी बहुत चिक्कन झाग देती है।
सुमेर कहाँ चुप रहने वाले थे....ढ़ेर देखावे में इहे होता है....नया- नया जब धन आता है न तो बुधिये मरा जाती है। कहाँ पानी में निमक घोर कर रोटी खाती थी फुआ की लड़का ब्रेड -मक्खन खिलाने लगा।
खैनी ठोंक कर ओंठ के भीतर दबाते हुए...अब जो नहीं दिया मुनरी के बदला मुनरी तो इज्जत तो भईया की जाएगी न।
औरत रात भर दांव पेच सिखाती रही थी सो सुमेर ने मौका देख कर दाव खेल दिया। बड़े भाई की भौंहें सुनते सिकुड़ गयीं....चिन्ता की रेखाएं चेहरे पर नाचने लगीं।
सबसे अन्त में मंगल लम्बी साँस छोड़ते बोले...केहू का दोस नहीं ...सब करम का दोस है महराज। नाहीं त बइठे बइठाए इ बलाए कहाँ से आती।
अब तक एक बार फिर मौन धरे बैठे बुढ़उ बाबा बोल पड़े...बचवा लोग, केहू का दोख नहीं सब इ कच्ची नाली का दोख है, जो परधनवा बनवा दिया होता तो मुनरी माटी में बैठती ही नहीं।
सबने एक स्वर में समर्थन किया....माहौल एक दम से राजनैतिक हो गया...सबकी तेवरियाँ तन गयीं...
मंगल...ससुर तीन बार से मियाँ बीबी परधान हो रहे हैं और मलाई काट रहे हैं। तीनों बार पक्की नाली और खड़ंजे का पैसा आया अउर महराज डकार गये।
अब तक चुप बैठे लड़के भी ताव देने लगें...
सुमेर का बड़ा बेटा कालेज में पढ़ता था...छात्र राजनीति का नया चस्का लगा था। जोश में खड़ा हो गया...सही कह रहे हैं बाबा... कुल दोस इ नाली का है। बस्सss एक दरखास डालनी पड़ेगी जिला पर ..हाथ लहराते हुए, ..ई ससुर के नाती सोझ हो जाएंगे।
मंगल व्यंग्य में मुस्कुरा कर कहे....पनरह बरिस में केहू उसका रोंआ न उखाड़ पाया, तुम चार दिन के लौंडे सबक सिखाओगे।
लड़के के स्वाभिमान पर करारा चोट पड़ा ...तिलमिला गया...त आपो देखिए चचा हम का करते हैं।
घर में से सादा पन्ना लाकर दरखास लिखा और लगे हाथ सबसे दस्तखत और अंगूठे का निशान ले कर दावा किया कि एक हफ्ते में नाली बनवा कर दिखाएंगे।
अगले दिन चार लड़के जाकर ब्लाक से लेकर जिले तक दरखास्त डाल आए। ऑफिस के बाबुओं के कान खड़े हुए और खबर प्रधान तक पहुँची।
दुवार पर कुर्सी पर पैर रखे चिन्तित बैठे प्रधान का पारा हाई था। हाथ लहरा कर लड़के से कह रहे थे....हमारे खिलाफ अहिराने से दरखास पड़ी है।
लड़का गुस्से में कमर में खोंसी पिस्तौल पर हाथ फेरते...काहे परेशान हैं नाहक...एकाध जना ठोकाएंगे ससुर बुद्धि हरियर हो जाएगी।
परधानिन ट्रे में चाय लिए दुवार पर आयीं...का हुआ पप्पू के पापा? काहे गरमा रहे हैं, बेचारी अभी कुछ और कहती कि प्रधान मियाँ के न पाईं त बीबी के बकोटीं की राह पर कूद पड़े...
इ साली मेहरारू की जात गहना खातिर दुनिया खा जाएं...केतनों लाद दो संतोषे नहीं होता हरामखोरों को।
बेचारी औरत सहम गयी ...आँख भर आयी, ...हम कब मांगे जी
एsssचुप्प ....हम तुम्हारी नहीं मुनिया फुआ की बात कर रहे हैं, न ससुरी की मुनरी हेराती न ये बवाल मेरे कपार पड़ता।
लड़के का गर्म खून रह- रह कर उबल रहा था....अरे त का कर लेंगे इ लोग, तनी बताइए हमको? वह पूरे जोश में था ...हाथ बार -बार पिस्तौल पर जाता।
प्रधान की बेचैनी का आलम यह था कि छने कुर्सी पर बैठते तो छने उठ कर टहलने लगते।
आकर लड़के के पास बैठ गये...सिर पर हाथ रख कर..."जनता जागा है बच्चा" गहरी साँस छोड़ते हुए कहा।
लड़का हँसते हुए... आ त सोई कब थी?
प्रधान...जब तक अपनी पार्टी का शासन था बच्चा सब कुशासन माफ, अब ना चलेगा। विपक्षी दल वइसही घात लगाए बैठी है। मौका मिलते ई सब जो दिख रहा है न...गोल हो जाएगा। सामने गाड़ियों की तरफ इशारा करते हुए।
लड़का...हा हा हा...आप त अइसे डेरा रहे हैं जइसे पहली बार चोरी की है। डालने दीजिए दरखास...पइसा फेंक कर दबवा देंगे।
प्रधान....ना sssना बच्चा, "जनता जागी है तो बाघ भी हो जाएगी"...
लड़का...गुस्से में हाथ पटक कर कुर्सी के हत़्थे पर...बाघ को मारने के लिए बन्दूक है न।
प्रधान...तुम लोगों की हे कमी है कि तनिये में उबलने लगते हो, टी ब्लाक प्रमुखी लड़ाने वाली है और जो इ मामला उजागर हो गया न तो समझो गई भैंस पानी में।
लड़का चुप हो गया...अगले दिन देखते ही देखते पूरे गाँव में दुलारी-दुवारी ईंटा गिरने लगा....सैकड़ों मजदूर-मिस्त्री काम पर लग गये। हफ्ते भर में पूरे गाँव की पक्की नाली और खड़ंजा बिछ कर तैयार ...इस काम का जायजा सुमेर के नये -नये नेता हुए सुपुत्र स्वयं ले रहे थे। जनता नेता पर भारी पड़ गयी थी...मजाल की तनिकों लापरवाही हो काम में। सुमेर मगन थे...अगली परधानी बबुआ की पक्की देख। दुवार पर भिनहिए से दरबार जुटने लगा।
जनता जहाँ एक बूँद आशा पाती है भागती है। वह आशा का केन्द्र बन गया ।
प्रधान की तरफ से बार-बार प्रलोभन आ रहा था पर लड़का ग्राम सुधार के लिए अडिग था। भोरे बिहाने दरखास लिखवाने वालों की लाईन लगने लगी। सुलभ शौचालय ...लोहिया आवास से लेकर प्राइमरी के भवन निर्माण तक की आवाज उठने लगी। प्रधान पसीने से तर बतर त्राहि माम की मुद्रा में हांफते पैरों में आ गिरे...
कुछ पर सहमति /असहमति बनी और कुछ ही दिनों में लड़का साइकिल से मोटर साईकिल से चलने लगा।
गाँव की कुछ समस्याएं सुलझीं कुछ अनसुलझी ही रहीं और मंगल ये सोच -सोच कुढ़ते रहे कि जरूर मुनरी सुमेर के हाथ लगी वरना दुवार पर दुपहरिया कहाँ से आई?....इसी तरह के खयाली पुलाव मदन और झिनक के मन में भी पकते रहे।
इधर मुन्नी फुआ के घर भी बरात उठने का दिन आ गया....वह मन ही मन उस दिन को कोसतीं जिस दिन बाजार से हजार का सौदा किया....दुकान वाला छः सौ में रोल्ड गोल्ड का झुमका सिकड़ी दे चुका था....सबसे महंगी चार सौ की अंगूठी देते हुए कहा था....ले जाओ चाची.."सोने से कम नहीं, खो जाए तो ग़म नहीं"...सुर्तवाला मचिए मार दिया था नहीं तो इतनी महंगी सफेद नग की मुनरी कभी न लेतीं। मुन्नी फुआ का जीवन अभावों और संघर्ष में बीता...लड़का पढ़ने में तेज था...पढ़ाया, तन- तन का जेवर उतार दिया और बेटा साहब बन गया। बस एक गलती कर दी, दहेज के लालच में बहू बड़े बाप की बेटी उतार ली। दहेज की मोटी रकम से गाँव का मकान तो आलीशान बन गया पर बहू एक दिन गाँव नहीं ठहरती और न ससुराल के लोगों से सटती।
हाँ बेटा जरूर खयाल रखता ...दहेज में मिली चार चक्का गाँव में छोड़ दी माँ -बाप के लिए...हर महीने पैसे भेजता और समय-समय पर गाँव आ खैर खबर लेता रहता। समझदार था माँ और पत्नी में ताल मेल बिठाए हुए था...दोनों अपनी अपनी जगह खुश थीं कि फुआ को मुनरी का सदमा लगा। बारात वाले दिन फुआ का बेटा भी नीली बत्ती गाड़ी से ननियौरे आया ....औरतें कोने कतरे से झांक -झांक देखतीं...ये पहली घटना थी जो सुलेमनपुर अहिरौटी की किसी लड़की का बेटा साहब हुआ था। बड़ा मान ...जिसको देखो वही सलामी ठोंक जाता।...अगली सुबह बेटे ने माँ से कहा...चलिए आपको गाँव छोड़ते चलूंगा। फुआ तैयार होने लगीं...बडी भौजी को पति ने आदेश दिया कि अपनी बड़की मुनरी बिटिया को देखो, तुमको बनवा दूंगा। बेचारी को काटो तो खून नहीं, जानती थी न नौ मन गेहूँ होगा न राधा उठ कर नाचेंगी। अंगूठी कभी न बनेगी, मन मार कर साहब भानजे के सामने इज्जत बचाते हुए उंगली में से नैहर की सबसे भारी मुनरी उतार कर ननद को देते हुए कहा....अब जीजी हमारी हीरा देने की औकात तो नहीं, इसी पर धीर धरो। हाय!....मुन्नी फुआ मारे खुशी के लहालोट..., चार सौ में चालीस हजार का सौदा, ...मन ही मन तौला...ड़ेढ़ भर से कम न थी, एतनी खुश ...एतनी खुश की मन भर सबको आशीष दिया और गाड़ी में भर रास्ते गुनगुनाती रहीं...एही ठंइन मुनरी हेरानी हो रामा, कहाँ जाईं ढूंढ़े...
