bhagyashree saini

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3.6  

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बेटियां आधार या जिम्मेदारी?

बेटियां आधार या जिम्मेदारी?

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‘क्या है मेरा अस्तित्व?’ जीवन में कहीं न कहीं, कभी न कभी, ये सवाल हम सब ने खुद से किया है। इस कहानी में ऐसे ही कुछ सवाल आप पायेंगे |  

शौर्य के साथ बात शुरु ही की थी, कि वह दरवाज़ा बंद करके निकल गया। किचन को समेटते हुए, आज मन में हज़ारों ख्याल आए। जॅाब छोड़ने का दुख आज से पहले कई बार हुआ, पर आज कुछ और बात अंदर ही अंदर दस्तक दे रही थी। शायद, अब मन का अकेलापन बढ़ने लगा था। तुरंत नज़र दीवार पर एक तरफ लगी उस तस्वीर पर गई जिसपर लिखा था “MADE FOR EACH OTHER”। पर नज़रों ने जैसे उसे देखने की इच्छा ही नहीं रखी। दौड़ती नज़रें दूसरी ओर रखे उस फोटो फ्रेम पर रूक गईं, जिसमें लगी फोटो को देखकर यादें, फिर से मेरी कहानी के पहले पन्ने पर पहुंच गईं “मेरी आवाज़”–यही था वो नाटक!


हाँ याद आया! जब कायरा पुकारा गया, तालियों की गूंज में एक हीरो की तरह मैं स्टेज की ओर बढ़ती चली गई। हाँ, यही था वो दिन, जब, शायद आखिरी बार मेरी आवाज़ बुलंद थी। ये सोच ही रही थी कि दिल ने जैसे खुद को इजाज़त दे दी कि ‘मुस्कुरा लो’। देखते ही देखते, एक छोटी सी मुस्कान ने चेहरे पर दस्तक दे दी।

‘क्या है मेरा अस्तित्व?’ बचपन में, शायद ही कभी ये सवाल मन में आया हो।

‘एक बेटी- उम्मीद, या अनचाही सी एक जिम्मेदारी?’

आज के ये सवाल, शायद उस समय, बचपन की पूरी होती छोटी-छोटी चाहतों में कहीं खो जाते थे।

मेरे अंदर भी एक कवि है, एक लेखिका है, और, हर उम्मीद पर खरा उतरने की हिम्मत भी है। फिर भी, ‘जीवन के इस युद्ध में चुनौतियों का ये दोहरा बोझ मुझ पर ही क्यों?’ ‘क्यों बाँट दिया सोच को, अवसरों को, अधिकारों को दो भागों में?’

आज, इतना फासला तय करने के बाद, खुद को एक कठघरे में पाती हूँ, और अक्सर ये सवाल पूछती हूँ कि, ‘क्यों मैंने ज़िद नहीं की, हर उस छोटी-बड़ी बात के लिए, जो मेरे हक की थी?

‘क्यों मैंने जवाब नहीं दिया, हर उस बात का जिसका कोई अर्थ नहीं था?’

जीवन के हर पहलू का हिस्सा बनने की चाहत लिए हर दिन को मैंने स्वीकार किया। ‘क्या ये फ़ैसला मेरी भूल थी?’

आज, अक्सर इस बात की ज़िद लिए बैठी रहती हूँ कि कभी तो सवालों का एक सिलसिला शुरू हो, जहाँ पूछ सकूं-‘जब संस्कारों का प्रतिनिधित्व मैं थी, तो आधार क्यों नहीं?’

‘क्यों मेरी हर बात का मोल नहीं था?’

‘क्यों था अधूरा सा सब मेरे हिस्से?’

‘क्यों हर बार, मुझे अपने लड़की होने का, कभी बेटी, कभी माँ, कभी पत्नी होने का अहसास इस लिए नहीं दिलाया गया क्योंकि हर रूप में मेरा योगदान है, बल्कि सिर्फ इसलिए, कि जीवन की इस सभा की आखिरी पंक्ति में ही मेरा स्थान है?’

‘क्यों मेरी उड़ान को वो भरोसा नहीं दिया, जहां हर कदम बढ़ाने से पहले जीत का कोई संदेह न होता?’

ये सवाल आजकल अक्सर मेरा साथ निभाते है।

पर कब तक?

ये सवाल मैंने आज तक खुद से नहीं किया।



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