Adhura sach
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पहाड़ों के बीच बसा 'निलय विला' अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर था, लेकिन समीर के लिए यह सिर्फ एक पुरानी संपत्ति थी जिसे उसे बेचना था। समीर एक रियल एस्टेट एजेंट था और पिछले तीन महीनों से वह इस घर के लिए खरीदार ढूंढ रहा था।
अजीब इत्तेफाक
एक शाम, भारी बारिश के कारण समीर को उसी विला में रुकना पड़ा। रात के करीब 12 बजे, जब वह लिविंग रूम में बैठा फाइलें देख रहा था, अचानक ऊपरी मंजिल से किसी के चलने की आवाज़ आई।
थप... थप... थप...
समीर को लगा शायद कोई चूहा होगा। लेकिन फिर उसे पुराने ग्रामोफोन से एक धीमा संगीत सुनाई देने लगा। वही धुन, जो उसकी दिवंगत दादी गुनगुनाती थीं।
वह कमरा नंबर 302
समीर टॉर्च लेकर ऊपर गया। आवाज़ कमरा नंबर 302 से आ रही थी। उसने कांपते हाथों से दरवाजा खोला। अंदर सन्नाटा था, लेकिन खिड़की खुली हुई थी और पर्दे हवा में लहरा रहे थे। अचानक, उसे ड्रेसिंग टेबल के शीशे में एक साया दिखा।
समीर पीछे मुड़ा, तो वहां कोई नहीं था। लेकिन जब उसने वापस शीशे में देखा, तो वहां लाल लिपस्टिक से लिखा था:
"तुमने उसे क्यों नहीं बताया?"
एक पुराना राज
समीर के पसीने छूटने लगे। उसे याद आया कि 10 साल पहले उसकी छोटी बहन, माया, इसी कमरे से गायब हो गई थी। पुलिस ने इसे एक हादसा मानकर फाइल बंद कर दी थी।
तभी नीचे के दरवाजे की घंटी बजी। इतनी रात को कौन हो सकता था? समीर नीचे गया और दरवाजा खोला। सामने एक बूढ़ा आदमी खड़ा था, जिसके हाथ में एक पुरानी डायरी थी।
"समीर बेटा, मैं तुम्हारे दादाजी का वकील हूँ," बूढ़े ने कहा। "उन्होंने मरते समय यह डायरी मुझे दी थी और कहा था कि जब तुम इस घर को बेचने आओ, तो तुम्हें यह दे दूँ।"
चौंकाने वाला अंत
समीर ने कांपते हाथों से डायरी खोली। आखिरी पन्ने पर लिखा था:
“माया कहीं गई नहीं है। वह आज भी इसी घर की नींव में है। उसे बचाने की कोशिश में मैंने उसे खो दिया, पर सच यह है कि उस रात कमरे में तुम भी थे, समीर। तुमने ही खेल-खेल में उसे उस गुप्त तहखाने में बंद किया था जिसे तुम भूल गए।”
समीर का सिर चकराने लगा। अचानक उसे सब याद आने लगा—बचपन का वह खेल, वह छिपने की जगह जिसे उसने कभी दोबारा नहीं खोला। वह तेजी से तहखाने की ओर भागा।
जैसे ही उसने तहखाने का भारी दरवाजा खींचा, अंदर से वही संगीत सुनाई देने लगा जो उसने ऊपर सुना था। कमरे की बत्ती अपने आप जल उठी, और दीवार पर परछाईं बनी—एक छोटी बच्ची की, जो हाथ हिलाकर उसे बुला रही थी।
समीर ने पीछे मुड़कर देखा, तो वकील गायब था। बाहर बारिश थम चुकी थी, लेकिन घर के अंदर से अभी भी आवाज़ आ रही थी: "भैया, अब मेरी बारी है छिपने की..."

