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पुनः है ...

पुनः है दासता स्वीकार या स्वच्छंद बनना है शत्रुओं के लिए विष धार या मकरन्द बनना है कुटिल, कपटी करेंगे ही भ्रमित निर्णय तुम्हें लेना विवेकानंद बनना है या फिर जयचंद बनना है

By Vaibhav Dubey
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