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हर शाम...

हर शाम ख्वाबों के पर्दों के पार जाता हूँ मैं.... अपने ही लफ़्ज़ों से हर दफ़ा हार जाता हूँ मैं.... ग़ज़ल अपनी मुकम्मल करने के खातिर.... कभी सपनों को, कभी खुद को मार जाता हूँ मैं....

By Vishal Sinha
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