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ढलते...
ढलते हुए सुराज...
ढलते हुए...
“
ढलते हुए सुराज को देख कर बैचेनी सी होती हे। ऐसा लगत है तूम दुर जा रह हो। फ़िर उस आसमन को देखकर सोचती हूँ, 'जोओगे नही ते दुबारा वापस केसै आओगे?'
”
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