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अधेंरे...
अधेंरे की अपनी...
अधेंरे की...
“
अधेंरे की अपनी ही ज्योती
कभी गौर तो करो
खामोशी की भी अपनी ही आवाज़
कभी सुनने की पहल तो करो
तन्हाई की भी अपनी ही अढांज़
जनाब... कभी आज़मा के तो ढेखो।
”
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