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ज़िंदगी की रुसवाई देख

ज़िंदगी की रुसवाई देख

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ज़िंदगी की रुसवाई देख,

फिर वहीँ ले आई देख।


कद से बात नहीं बनती,

तू सोच की ऊँचाई देख।


मुझको छोटा कहने वाले,

तू अपनी गहराई देख।


इतना मीठा बोले है तू,

बातों की तुरपाई देख।


पहले जग में मन लगा तू,

फिर जग की तन्हाई देख।


खुद से बातें करते करते,

आँख मेरी लग आई देख।


पहले घर की आग बुझा तू,

फिर किसने आग लगाई देख।


ज़रा सा छेड़ा क्या ज़िंदगी को,

कितनी वो घबराई देख।


जी ऐसे किरदार में "राहत",

कैद देख न तू रिहाई देख।


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