तू क्या समझे
तू क्या समझे
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बेबस हूं मेरी इल्तज़ा, फ़रियाद को खैर तू क्या समझे,
यूं देखना, तेरे बगैर गम ए ज़िंदगी में रहना तू क्या समझे ।
बैर बना रखा है हमने हर वफ़ा शिआर हुस्न से,
तेरा ज़िक्र मेरे तारूफ में फिर भी गैरियत तू क्या समझे।
ज़मीन मिलती है हर ख़्वाब को जो पूर्जोर कोशिश करे,
तेरे होने पर भी मेरा गैर का होना तू क्या समझे।
नही चाहते की तुझे बुरा भी लगे किसी तरह,
लोगो का तड़पना, रोना तू क्या समझे।
क्यूं करता है ये जब किसी और की है तू,
वाफादरी और ये जज़्बात तू क्या समझे।
ना हो तुम कोई अप्सरा फिर भी तुम्हें देर तक तकना,
"अंकित" की मोहब्बत का फितूर हैं तू क्या समझे।
