साकी तेरी यही कहानी
साकी तेरी यही कहानी
कसूरे मंज़िल क्या कहूँ साकी
जब कारवां गुमराह हो,
कारवां आखिर क्या करे
जब सरदार बेअसरदार हो,
जरूरी नहीं भीड़ हमेशा
सही दिशा को प्रस्थान करें,
मुमकिन है भ्रमित करके
जान पर आन पड़े,
ऐसा अक्सर होता अगर तो
क्यों सीता अग्नि परीक्षा देती?
हिटलर के झांसे में आकर
क्यो जनता बेमौत मरती ?
सांसों से क्या गिला साकी
जब हवा ही प्रदूषित है
बाहर गिद्ध मंडरा रहा है
अंदर बहुत ही घुटन है
भीड़ को खुद पता नहीं
किस दिशा को जा रहा है,
साकी वही पी रहा है
जो पैमाने से छलक कर गिर रहा है,
पीने वाला बेहोश पड़ा है
साकी खुद पर इतरा रहा है,
अपनी जिम्मेदारी निभाकर
खुद पैमाना धोकर पी रहा है,
राख भी पी गया जालिम
सरदार के इशारे पर,
आखिरी कश लेकर जो फेका
पैमाने के किनारे पर,
रंगा रंग महफिल सजा है
हर शख्स जहां सम्मोहित है
पुरोहित सबको भावुक करके
ताली -थाली बजवाता है,
जीवन भर फल खिलाया
आम के बगान ने,
अंतकाल चीड़ फाड़कर
जला दिया इंसान ने,
यही विडंबना इस जीवन का
झूठ फरेब ढकोसला है
भीड़ भरोसे की लालच मे
गलत दिशा को निकला है
महफिल में मैं भी शामिल हूं
देखा देखी चल दिया
तेरे जज्बाती जाम साकी
पैमाने का रंग बदल दिया
सुरूर जरा उतरने दे
गुरुर खुद ढल जाएगा,
चंद दिनों की महफिल है
खाली बोतल रह जाएगा,
उपयोग हो रहा है साकी
कब तक पैमाने से चिपका रहेगा
तोड़ दे पैमाने को
वरना जीवन भर अटका रहेगा,
