रंग बदलते रोग
रंग बदलते रोग
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कितने अंजान चेहरे दुनिया में मिलते हैं,
उनमें से कितने जो जिंदगी भर चलते हैं।
कुछ शक्ल के सुंदर मौकापरस्त होते हैं,
बदन को छूकर सब कुछ कर गुजरते हैंं।
कुछ अक्ल के मंद दिल के समुंद्र होते हैं,
कुछ कर गुजरते नहीं मगर दुख हरते हैंं।
मन के कपटी गिरगिट सा रंग बदलते हैंं
पास रह कर भी हम से कुछ अखरते हैंं।
कुछ दूर रहकर भी दिलों में ही बसते हैं।
कुछ साथ रहकर भी दूर रहते हटते हैं।
किस पर करें यकीं लोग सिरफिरे से हैं,
मौका मिलते ही जी भर जहर उगलते हैं।
फिक्र न कर जिक्र करते रहो मनसीरत,
कहने वालों का क्या वो कहते रहते हैं।
