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Hare Prakash Upadhyay

Others

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Hare Prakash Upadhyay

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रास्ते रोकने वाले

रास्ते रोकने वाले

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तुम रास्ते रोकते हो

कई बार यह इस तरह सहज हो जाता है तुम्हारे लिऐ कि

तुम जानते भी नहीं हो कि तुम रास्ते रोकते हो

तुम लगे रहते हो

हरदम सोचते रहते हो

कि किस तरह उसका निकलना बंद कर दो

किसी भी तरफ़

 

तुम इस बात में अपनी काबिलियत समझते हो

कि तुम एक भी रास्ते नहीं रहने देते हो उसके

उसकी परेशानी छटपटाहट देखकर

तुम्हारी आक्रामकता बढ़ती जाती है

तुम्हारे भीतर एक राक्षस अट्टाहास करने लगता है

तुम्हारी भुजाएँ दस हो जाती हैं

तुम ऐंठ कर बोलने लगते हो

 

तुम इसी में खपाते हो अपने को

और एक दिन तुम पाते हो

कि वह तो निकल ही गया

एक रास्ते से

 

जब वह तुम्हारी पकड़ से बाहर चला जाता है

तुम्हारे देखते-देखते

और तुम वहीं खड़े रह जाते हो

वह आगे निकल जाता है

तब तुम्हें लगता है

कि तुमने रास्ते रोकने की जगह

अपना एक रास्ता बनाया होता

तो वह कितना काम आता तुम्हारे

सुनहरे भविष्य की ओर कदम बढ़ाने में

वैसे तुम्हें कई बार इसका कोई आभास ही नहीं होता

 

तुम किस क़दर पिछड़े हो यह तुम समझ ही नहीं पाते

तुम्हें बहुत तो अपने शिकार का बहक जाना भर दिखता है

तुम बस थोड़ा सा पछताते हो

और फिर किसी और के रास्ते रोकने लगते हो

तुम्हें शायद इस काम में मज़ा आता है

या तुम आदत के गुलाम भर होते हो

 

तुम बस लगे रहते हो

अगला शिकार भी एक दिन रास्ता निकाल लेता है

फिर तुम अगले को शिकार बनाते हो

और इस तरह शिकार करते-करते

तुम एक दिन ख़ुद किसी हादसे का शिकार हो जाते हो

तो जिनके तुम अब तक रास्ते रोकते रहे हो

वे ही तुम पर तरस खाते हैं

पर तुम यह बात कभी जान नहीं पाते हो...


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