पवनपुत्र हनुमान
पवनपुत्र हनुमान
लेटा था मैं अलसाया यूं ही फुर्सत के निजी क्षणों में
मन में आया क्यों ना लिखूं सुंदर कविता में आज।
अनायास ही मेरे मन में हुआ प्रभु का आभास
कविता हो लघु क्यों ना, लिखूं मेरे प्रभु पर आज l
है नमन पवनपुत्र मेरा, आप सा भक्त नहीं जग में दूजा
हर पल जो प्रभु नाम का सुमिरन कर ना थकतेl
प्रभु की भक्ति में ही सदैव मगन, सेवा में तत्पर रहते
ना की प्राणों की परवाह उनकी आज्ञा शिरोधार्य करते ll
पा प्रभु राम की सम्मति हनुमान अशोक वाटिका पहुँचे
विध्वंस कर वाटिका मां सीता के पास पहुंचेl
नमन कर माँ सीता को बातों से धीरज बंधाया
मिला परम संतोष प्रभु को, सीता का संदेश सुनायाll
सुन प्रशंसा प्रभु मुख से धन्य धन्य हुए थे महावीर
जब बंधे नागपाश में प्रभु मुक्ति दिलाई केसरी नंदन नेl
लगा शक्ति बान लक्ष्मण को, प्रभु मूर्छित लक्ष्मण चिंता में
संजीवनी बूटी ला, प्राण बचाए मारुति ने लक्ष्मण के।।
