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सरफिरा लेखक

Others

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सरफिरा लेखक

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मां के बिना थम सी लगी जिंदगी

मां के बिना थम सी लगी जिंदगी

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जिंदगी यूं ही कम सी लगी मुझे

मां के बिना थम सी लगी मुझे

जिंदगी में अकेला नहीं था कभी

मां बिन जिंदगी गम सी लगी मुझे। 


लगी मुझे जिंदगी डूबते तिनके की तरह

मेरे सर का सहारा रूठ गया मुझ से

कर्ज से बनाया मां ने आशियाना अपना

बंटवारे के कारण ही टूट गया मुझ से।


टूट गया मुझ से वो ही

आशियाना जो पावन था

मां ने प्यार दिया राम बनाया 

ना समझ सका मैं तो रावण था। 


रावण था मैं जालिम था मैं

था मां के आंगन का हत्यारा

कीमत कोई चुका नहीं सकता मां की

मां से सृष्टि मां से दृष्टि मां से है उजियारा।


सृष्टि मां से है , है पावन धाम तू

गीतों का साज बसंत का राग तू

तू रात दिन सुबह शाम आसमान तू

तू ही काशी वृंदावन हरिद्वार नाम तू।


नाम तेरा पवित्र है गंगा के झरनों से

अब मां का बेटा होना चाहता हूं जन्मो से

मैं पापी डूब गया अपने ही कर्मों से

जीवन भर ले लूं आशीर्वाद मां के चरणों से


डूब गया हूं मैं उस लालच के पानी में

मैंने ही घर से निकाला मां को जवानी में

शुरू से अंत तक दर्द भरा है मां की कहानी में

दो पल के जीवन एक पल की रवानी में।


की जीवन भर मां से दूर रहा हूं

वो रोती तड़फती रही मेरी याद में। 

मैं भी मां को मां ना समझ सका कभी

अब मेरे भी आने लगी मां ख्वाब में। 


आने लगी ख्वाब में एक सूरत बन कर

यूं लगा कि जन्म फिर से हुआ मेरा

आकर मुझे फिर से चूम दे जरा सा 

धन्य होगा ये जन्म फिर से मेरा


मैं किस लालच में दूर हूं अब तक

क्यों मां की ममता जान ना पाया हूं

आज समझ गया प्यार तेरा मेरी मां

मैं बच्चा बन के फिर से तेरे पास आया हूं। 


आया हूं तेरे आंगन घर का तारा बन के

मां आजा सीने से लगा मुझे जी भर के

तेरे बुढ़ापे के ये हाथ सर पे मेरे रख दे

दे फिर से आशीर्वाद मुझे झोली भर के। 


भर दे झोली जो बरसो से खाली थी

ना जाने वो बात बहुत रुलाती है 

बचपन में कर के दुलार जो तू पाली थी। 


पाली थी तू सब भाइयों को 

तुझे कोई ना पाल सके

नौ महीने तक रखा गर्भ में तूने

हम एक महीने भी घर ना रख सके। 


 ना हम रख सके तुझे तेरे ही आशियाने में

जो तूने कोड़ी कोड़ी जोड़ बनाया था

 मैं पापी तेरा हाथ पकड़ कर तुझे

वृद्ध आश्रम छोड़ ही आया था। 


छोड़ आया था नजरों से दूर तुझे

घर से मां ही शब्द गायब हो गया

बिन मां के सोया नहीं बचपन में

मां की लोरी बीन ही सवेरा हो गया। 


मैं इंतजार करता रहा मां का

मां रूठ कर चली गई

फिर लौट कर आईं नहीं


पर्वत पर्वत घूम रहा था 

मां सा कोई धाम नहीं

मां से सृष्टि मां से दृष्टि

मां बिन कोई संतान नहीं। 



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