मां का आंचल
मां का आंचल
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आज कई दिनों के बाद ,
मां के साथ सोने का मौका मिला।
ठंड लग रही थी हल्की हल्की,
पर ना कोई कपड़ा ओढ़ने का मिला।
तब अचानक मां ने अपना पल्लू,
ओढ़ा दिया मुझ पर चादर बनाकर।
मेरा मन तब किया लग जाऊं,
उसके सीने से,
सारे गम भुला कर।
आंसुओं से गीले हाथों को,
उसके पल्लू से कर लूं साफ।
परेशानियों से थकी आंखों को,
मां दे दे पल्लू की गरम भाप।।
खाने से लथपथ मेरे हाथों को ,
मां के पल्लू से रगड़ लूं ।
मेरा बचपन लौटा दो मुझे,
इस बात पर मैं अपने रब से झगड़ लूं ।।
गर्मी में आए पसीने को,
मां के आंचल से सुखा लूं ।
मां का साया हमेशा बना रहे,
रब से कुबूल यह दुआ करा लूं।।
हमेशा बनी रहे मुझ पर,
यह पल्लू की छाया ।
सच कहूं तो मां को छोड़कर,
सारा जग है पराया।।
