लौटा दो मेरा बचपन
लौटा दो मेरा बचपन
जब ऊँगलियां पकड़ कर दोस्ती हो जाया करती थी
चलो, आज उस बचपन की झलक दिखाती हूँ,
उन यादों की सैर कराती हूँ।
किलो के भाव बिकती थी वो कॉपियां
जिन पर वैरी गुड देेेखकर फूले नही समाते थे,
और कहानी सुनने के बाद डिब्बेे
मे बंद परले जी कमाते थे।
बात तब की है, जब हाफ डे के
टिफ़िन में मैगी ले जाने को तरसते थे,
पैर तो चाहकर भी कमरे के अंदर नही रहते थे,
जब सावन में मेघ बरसते थे।
सर के ऊपर पतंगों से भरा आसमान था,
खिलौनों के नाम पर राजगद्दी से खरीदा तीर-कमान था।
घूमने के लिए मॉल नहीं, मेला था,
डोमिनोस नही, मेरठ कि मशहूर चाट का ठेला था।
जब बिर्थ डे पर 100 रुपये की चोकोलेट नहीं,
1 रुपये कि 4 टॉफी खरीदा करते थे;
उस बचपन का सवाल आज भी जिंदा हैं,
क्या कभी अप्सरा की रबर को खत्म किया करते थे?
अब कागज़ हैं, पर वो कश्ती नहीं
जिसे बहाया जाए,
गुड़िया रखी है आज भी,पर
बचपन नहीं, कि उसे सजाया जाए।
कॉपी के पीछे जब कट्टा-ज़ीरो खेले थे,
वो दिन भी क्या अदभुद-अलबेले थे।
