STORYMIRROR

heartords .

Others

4  

heartords .

Others

क्यूं

क्यूं

1 min
372

आज तेरी दर पर आया मैं

दुखों का अंबार लिए 

भार बेशुमार लिए,

सर झुकाया तेरे सामने

या झुका भार तले?

ओ मेरे वाहेगुरु 

समझ न पाया मैं 

कहां से शुरू करूं. . . 


अरदास करने आया था 

वो जो कहीं मिल नहीं रही 

उससे जरा मुलाकात करने आया था 

शांति जिसे मैं गंवा बैठा हूँ कहीं 

उसे एहसास करने आया था 

हाँ शायद पहली बार में

अपना स्वार्थ सोच आया था। 


फिर क्यूं खुद के लिए 

कुछ मांग ना सका मैं

उसके लिए दुआ मांगने से 

खुद को रोक ना सका मैं

फिर क्यूं तुझे उसके नाम से बुलाया मैं?

फिर क्यूं आंखें बंद करते ही 

उसको ही पाया मैं, क्यूँ ?


हां खोया था, रोया था

खुली आंखों से सोया था

पर बीज तो दोनों ने साथ बोया था

तो फिर कांटों ने 

मुझे ही क्यों चुभोया था?


बैठा रहा तेरी दर पर

सुध बुध का होश न रहा 

क्या सही क्या गलत 

उसका मुझे अब बोध न रहा 

चल न पड़ूँ उस राह 

जहां लोग दिल-ए-बेईमान जाते हैं  

चंद खुशियों की खातिर 

बेच ईमान आते हैं

बदल इंसान जाते है।   


रूह कुछ बर्बाद सी लगती है

ये सुबह रात सी लगती है

तेरे बिना ओ वाहेगुरु 

ये तेरी कायनात शैतान सी लगती है

हैवान सी लगती है।


हाँ पता है मुझे 

इंसान नहीं है अच्छा वो 

पर जानी मुझे वो 

दुआ-ए-नूर सी लगती है

खुदा-ए-मंजूर लगती है।


Rate this content
Log in

More hindi poem from heartords .