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Vibhu Gaur

Others

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Vibhu Gaur

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जिन्दा हूँ मैं

जिन्दा हूँ मैं

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सवालों के जवाब

और जवाबों में हिसाब

ढूँढता ही रहा मैं,

देर लगी तो

सहमें से पत्तों की तरह

झूमता ही रहा मैं,

कुछ मन का किया

कुछ कडवाहट इन रिश्तों में

महसूस भी की है,

रास्ते की चमक

और कुछ पाने की ललक

विरासत में मिली है,

एहसान के आगोश में

लिपटा हुआ एक अपाहिज सा परिंदा हूँ मैं,

लाशों की बस्ती का राजदार सा कोई

अपरिचित बाशिंदा हूँ मैं,

नजर जिस सीध में

जाती है हरसूं मेरी

वहीं मेरा सवेरा भी है,

सवाल कुछ मुट्ठी में लिये

लाशों के बीच बैठा जरूर हूँ,

जवाबों की मौत का प्रत्यक्ष

पर अभी जिन्दा हूँ मैं।


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