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जीत गऐ हैं बच्चे

जीत गऐ हैं बच्चे

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पलक झपकते ही बड़े हो गऐ हैं ये बच्चे
कुछ देर पहले तक जो बालू में खेल रहे थे
इस समय उन्हीं बच्चों की टोली 
नदी के भीतर लहरों से जूझ रही है
एक डूबते हुऐ आदमी को बचाने की ज़द्दोज़हद जारी है
बच्चे बड़ों से भी कई गुना बड़े नज़र आ रहे हैं
लहरें एक बार फिर हार गईं है
जीत गऐ हैं बच्चे 
यमराज के हाथ से छीन लाऐ हैं एक ज़िन्दगी
मैले-कुचैले कपड़ों और पानी से चिपके बालों वाले
ये बच्चे गंदगी की पहचान नहीं
सभ्यता के वाहक नज़र आ रहे हैं
जो अपने सामने किसी को मरता हुआ नहीं देख सकते
इन अनपढ़ बच्चों को समझ नहीं आती शुक्रिया की भाषा
अपने किऐ के एवज में नहीं माँगते वीरता के पदक
न ही जिसे बचाया है उससे विजिटिंग कार्ड और पता
कि कभी हारे-गाढ़े अपने पुण्य के एवज में कुछ पाने को सोचेंं
बेहोश आदमी की बोली लौटने पर हँस पड़ते हैं सब एक साथ
एक सुख सबके हिस्से में बराबर-बराबर बँट जाता है
हाँ, ये पढ़ लेते हैं सामने वाले की आँख में कृतज्ञता का भाव
इसमें पीढ़ियों का अनुभव काम आता है
मरने वाले रोज़ चेहरे बदल-बदल कर आते हैं इन घाटों पर
बचाने वालों का कुछ नहीं बदला, न वे न उनके हालात
उम्र के साथ बदलती हैं सिर्फ़ उनकी पीढ़ियाँ
कल इनके पिता थे यहाँ इन घाटों पर 
आज ये विरासत सँभाल रहे हैं
कल आऐंगे इनके बच्चे फिर बच्चों के बच्चे
सबके हिस्से होंगे पचास-सौ किस्से
लहरों को परास्त करने, मौत को मुँह चिढ़ाने 
और ज़िन्दगी पर जीत दर्ज़ करने के।
 
-प्रताप सोमवंशी


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