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इंसानियत

इंसानियत

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इंसानियत देखो सिर छुपा कर रो रही है
अपने कंधो पर इंसान का भार ढो रही है|
इंसानियत दर-दर पे खटखटा रही है
अपनी व्यथा रो कर सबको सुना रही है|

इंसानियत के कारण ये इंसान, इंसान है
पर भूल रहा इंसान इसका क्या ईमान है|
भूल कर ईमान वह बन गया शैतान है
सिर उठा कर घूमता दिखाता झूठी शान है|

इंसानियत को भूल वह बन गया हैवान है
बेटा ही माँ बाप की देखो ले रहा जान है|
रिश्तों को शर्मसार कर रहा ये इंसान है
रिश्तो में पवित्रता का रह गया नाम है|

दिल में उसके अरमान ही अरमान है
अरमानों को पूरा करने जाता चारो धाम है|

मुँह से जपता वह केवल राम राम राम है

पर दिल में नहीं इंसानियत का नाम है|

जगह-जगह इंसानियत शर्मसार हो रही है
घर में ही दुराचार होते देख रो रही है|
बूढी माँ वृद्धाश्रम में अपनी रोटी पो रही है
गर्भ में कन्या जिन्दगी के लिए रो रही है|

 

जगह-जगह देखो भ्रष्टाचार हो रहा है
हर जगह हैवानियत का साम्राज्य हो रहा है|
देखो आज समाज में यह क्या हो रहा है
लगता है इंसानियत का अंतिम संस्कार हो रहा है|


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