होली के रंग
होली के रंग
का संग मैं खेलूँ होरी
इत ते निकली नवल राधिका,
उत ते सब व्रज छोरी।
भर पिचकारी मारत मोहन,
रंग गुलाल मलो री...
का संग मैं खेलूं होली।
बाजत ढोल, मृदंग, झांझ व्रज,
और बजत शहनाई।
अबिर-गुलाल उड़न नभ लागे,
कैसी हरि धूम मचाई।
ऐसे ढीठ भए मनमोहन,
सखि अंग गुलाल मलो री।।
का संग मैं खेलूं होली ।
राधा बोली लियो सखियन को,
मोहन नारी बनाओ।
हीरा जरी किनारी सारी,
पुनि चोली पहनाओ।
मचे धूम व्रज खोरी।
का संग मैं खेलूं होली।
वेंदी भाल नयनन में काजल,
नक नथिया पहनाओ।
छोरो सब मनमोहन मूरति।
सिर चूनर ओढ़ाओ।
अंग -अंग रंग भरो री।
का संग मैं खेलूँ होली।
सुसकत जाय श्याम घर अपने,
भूलि जाय चतुराई।
जाइ कहैं फिर नंद बबा से,
हो यशुमति-मति भोरी।।
ऐसी मिली खेलो होरी।
का संग मैं खेलूँ होली।।
नहि गोकुल-मथुरा सम नगरी
जँह जनमे कुमर कन्हाई।
जांय 'सुमन' बलि श्याम चरण की,
अनत ठौर नहि पाई।
चल मन मधुवन खोरी,
खेलौं मनमोहन संग होली।।
का संग मैं खेलूँ होली।।
