हिंदी
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कहीं सहज ,सरल ,सुंदर सी समरस,
कहीं जटिल, कठिन,संस्कृतनिष्ठ ,क्लिष्ट;
कभी हृदय- हरण कर जाती है,
कभी साहित्य-सृजन कर जाती है।
लेखक का विचार बनी कहीं,
कभी कवि की कल्पना कहलाती है।
प्रेम- प्रतिष्ठा - राष्ट्रभक्ति से होकर,
समरसता का भाव जगाती है।
सिंधु से लेकर सागर तक,
एक सूत्रता का आभास कराती है।
किंचित इसीलिए यह यहां
मां सी पूजी जाती है,
जब बात विविधता में एकता की हो,
तो हिंदी है याद आती है...
हां हिंदी है याद आती है।
